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चैंपियन 'ईयर' 2011
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उधार की जिंदगी
13 दिसंबर 2001 का दिन हम कभी भूल नहीं सकते,क्योंकि ये वो काली तारीख है,जब पांच आतंकियों ने हमारे लोकतंत्र के मंदिर पर हमला किया और AK- 47 की गोलियों से हमारे सीने पर ऐसा जख्म दिया,जो आज तक ताजा है। हमले में हमने अपने 9 वीर सपूतों को खो दिया। शहीदों ने पांचों आतंकियों को मौत के घाट तो उतारा ही साथ ही साथ संसद भवन में उस वक्त मौजूद करीब दौ सौ से ज्यादा सांसदों को बचाया। पुलिस की तत्परता के चलते एक साल के भीतर ही हमले में शामिल एक मास्टर माइंड अफजल गुरू पकड़ा गया,लेकिन अफसोस की शहीदों ने जान की बाजी लगाकर जिन सांसदों को बचाया,वही सांसदों की जमात वोट बैंक के जाल में अफजल की फांसी को ऐसे उलझाया कि, फंदे की फाइल दिल्ली सरकार,गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति भवन की गलियों में भटक रहा है। ये तो थी हमले की कहानी,अब आते हैं असल मुद्दे पर,13 दिसंबर को टीवी खोला तो देखा कि,हमारे ज्यादातर सांसद संसद भवन परिसर में हमले में शहीद जाबांजों को श्रद्धांजलि दे रहे थे। पर श्रद्धांजलि देते वक्त मैंने देखा कि,सभी सांसद प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाने का ढोंग कर रहे थे। उनके आव-भाव से नहीं लगा कि,उनके दिल में शहीदों के लिए कोई इज्जत है। एकाध सांसदों को छोड़ सभी सफेदपोश हंसकर पुष्प अर्पित कर रहे थे। उस दृश्य को देख मैं काफी गुस्से में आ गया। मुझे अफसोस हो रहा था कि,क्यों उन 9 घरों के चिरागों ने अपनी जान गंवाकर इन सफेदपोशों को बचाया। उन्होंने अपने फर्ज का निर्वहन तो अपनी अंतिम सांस तक किया,लेकिन हमारे नुमाइंदे तो उनकी शहादत को सलाम करने के लिए अपना फर्ज तक भूल गए। दुख होता है जब संसद हमले का जिक्र होता है। फक्र होता है वीर सपूतों की शहादत पर,लेकिन शर्म से उस वक्त पानी-पानी हो जाता हूं जब सफेदपोशों की बेहया वाली हरकतों को देखता हूं। आंखों में पानी भर आता है,जब टीवी चैनलों पर शहीदों की मां,विधवा और बच्चों की व्यथा सुनता हूं। 13 दिसंबर को एक टीवी चैनल पर एक शहीद की विधवा बता रही थी कि, सरकार की ओर से उन्हें पेट्रोल पंप देने का ऐलान किया गया। जब वो अपना हक लेने पहुंची तो उनसे रिश्वत मांगी गई। इन हालातों को देख सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि,वाकई सिस्टम इतना बेइमान और बेशर्म हो गया है। राहुल गांधी कहते हैं उन्हें यूपी की बदहाली देख गुस्सा आता है। लाल कृष्ण आडवाणी को पश्चिम मॉडल से नफरत है। ऐसे में इन दोनों को सांसदों का आचरण और अफजल गुरू को जेल में देख गुस्सा क्यों नहीं आता है,अगर इन मुद्दों पर इनका खून खौलता तो निश्चित तौर पर मैं कह सकता हूं कि,इनलोगों को गुस्सा वहीं आता है जहां वोट बैंक का मामला होता है। हमारे नुमाइंदे ये क्यों भूल जाते हैं कि,जिस जिंदगी को वो जी रहे हैं,वो उन शहीदों की देन है। कहा जाए तो वो सभी उधार की जिंदगी जी रहे हैं।
भंवरी का भंवरा
दो दिए ज्यादा जलाएं
आओ दो दिए ज्यादा जलाएं
रोशनी के रंग भरे
जो रोशन कर दे जिंदगी
उम्मीदों की बाती संग
जो मिटा दे मन का अंधियारा
हम मनाए पर्व कुछ ऐसे
कि जीवन सबके रोशन हों
मन में उमड़े उमंग के छंद
और मधुर राग हो प्रेम संग
नित बहे राग बनकर
रोशनी का ये संगीत
रगों में बहता रहे
प्रकाश का मधुर गीत
बसा रहे मन में
हम सभी के
जीवन भर
रोशनी का आनंद संगीत
बूंदें....बारिश की...
अच्छी लगती हैं...
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जब सूने आंगन को भरती हैं बूंदें...
अच्छी लगती हैं...
जब कुदरत का श्रृंगार करें...
हर डाली को हार करें...
अच्छी लगती हैं...
लेकिन...
जब बाधा बन वार करें...
भंवर बन शिकार करें...
जीवन को रोके...
आगे बढ़ने से टोके...
नहीं भाती हैं...
आंस जाती हैं...
रास नहीं आती हैं...
बारिश की बूंदे....
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया...फेर...?
लंबे वक्त के बाद देखी एक अच्छी फिल्म
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भविष्य संवारने की जद्दोजहद या फिर बीते कल की परछांई से बोझल जिंदगी जीने वाले युवाओं को..तीन किरदारों के ज़रिए खुल कर जीने का अंदाज़ सिखाती ये फिल्म युवाओं को बेहद भाएगी क्योंकिं अंदाज़-ए-बयां काफी रोमांचक और नयापन लिए है..फिल्म देखते वक्त बस एक बात खटकती है कि आम इंसान के, एक मिडिल क्लास व्यक्ति के डर आसमान से कूदने,समुद्र की गहराई नापने या बुल-फाइट से कुछ अलग होते हैं...उसके मन की गहराईयों में छिपे छोटे-छोटे से डर मसलन,ऐसा करूंगा तो किसी को बुरा तो ना लग जाएगा, असफल हुआ तो क्या होगा,ऐसा किया तो ज़माना क्या सोचेगा...वगैरह-वगैरह ये तुच्छ से लगने वाले भय भी जीने का अंदाज़ बिसरा देने के लिए काफी होते हैं...ऐसे भय को पर्दे पर उतारने के लिए..जिन तीन इच्छाओं..डर...या ज़रियों को चुना गया है..वो पर्दे पर तो रोमांचक और नयनाभिराम लगते हैं..लेकिन साथ ही डायरेक्टर की कमर्शियल सिनेमा को हिट या प्लॉप करने की मजबूरी भी नज़र आते हैं...और इसीलिए ये फिल्म केवल युवाओं के मानस को छूती..उन्हीं की बात पहुंचाती नज़र आती है...वरिष्ठों से दूरियां बनाती लगती है...जबकि ये सच तो हर उम्र..हर वर्ग और हर किसी के लिए है कि..ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा...कल किसने देखा..सो जो आज है उसे जी लो...खुल के जिओ...हर पल को जीओ..दिल की सुनो...
क्या वाकई हम बदल रहे हैं...?
' हिन्दुस्तान'
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राहुल गांधी की फिसल गई है ज़बान
क्या यही है मेरा खौफज़दा हिन्दुस्तान
नहीं रुकेंगे देस पर ये आतंकी हमले
कांग्रेस के महासचिव का आया है बयान ।
मुंबई ब्लास्ट ने फिर हरे कर दिए हैं ज़्ख्म
कैसे कोई करे आतंकियों की पहचान
कैसे कोई रोके हर दिन होते इन हमलों को
हर शख्स को हमले दे रहें है गहरे निशान ।
अब तो खत्म हो ये खूनी होली
हर नागरिक का है यही अरमान
मज़हब के आड़ में हो रहे हैं झगड़े
कैसे पहुंचाया जाए सौहार्द का पैगाम.....
ये कैसा प्यार ?
...अब तक बॉलीवुड और टीवी सीरियल में इस तरह की स्टोरी देखकर लगता था कि क्या ऐसा दुनिया में होता
होगा...फिर सोचा ग्लैमरस लाइफ के लिए ये बात मायने नहीं रखती लोग कपड़ों की तरह रिश्ते बदलते है...और टीवी सीरियल में तो लोगों के मनोरंजन या टीआरपी के चक्कर में काल्पनिक तौर पर बनाया जाता होगा ...पर अब तो अपने आस-पास के लोगों को देखकर लगता है कि वाकई फिल्म वालों को भी स्टोरी हमारे बीच के लोग ही देतें हैं...आज 'प्यार' शब्द पर ही बात कर लें क्योंकि सारे रिश्ते और शब्दों पर बात करें तो उलझ सी जायेंगी...'प्यार' ये शब्द सुनते ही मन एक सुंदर सी भावना के आसपास घूमने लगता है...जिसमें त्याग, समर्पण, ईमानदारी जैसे भावों का समावेश हुआ करता था...प्यार का नाम सुनते ही याद आते थे वो कुछ लोग जो जाति-धर्म,ऊंच-नीच,अमीरी-गरीबी से परे एक दूसरे की परवाह के लिए अपनी जान तक दे चुके हैं...शायद सब जानते हैं हीर-रांझा,शीरी-फरहाद,लैला-मजनू को...पर आज के प्रेमी शायद इनकों बेवकूफ कहें तो चौंकियेगा मत...क्योंकि अब तो लोग प्यार को जीत-हार और जिंदगी के लिए सुख बटोरने का माध्यम बना
परदेस की अच्छी बातों से लें सबक
लेकिन ये सब देखकर एकबारगी अपने देश की सुस्त और लचर न्याय प्रणाली की तरफ ध्यान खुद ही खिंच गया और एक आक्रोश और गुस्से ने मन में जगह ले ली... वहां तो केवल छेड़छाड़ का आरोप था... फिर भी इतनी तत्परता दिखाई गई... उच्च पद पर आसीन उस व्यक्ति के कितने कॉन्टैक्ट्स होंगे उसका सहज अंदाजा आप लगा सकते हैं.... फिर भी जेल की हवा खानी पड़ रही है... लेकिन हमारे यहां आए दिन बलात्कार की खबरें देखने-सुनने को मिलती हैं... कहीं बाप ने बलात्कार किया... कहीं चाचा ने, कहीं पड़ोसी ने, कहीं भाई ने, कहीं जीजा ने, कहीं दोस्त ने... फिर भी सजा मिलना तो दूर अपराधी पकड़े तक नहीं जाते... गलती से पकड़ भी लिए जाएं तो भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था में उनका बचकर निकलना बहुत आसान होता है... हाई प्रोफाइल मामला तो दूर की बात है... यहां तो छुटभैये अपराधियों की भी इतनी पहुंच होती है... कि पुलिस पहले तो मामला दर्ज नहीं करती... और दबाव में जबरन मामला दर्ज करना भी पड़ गया तो कार्रवाई अत्यंत धीमी होती है... इससे भी आगे कार्रवाई हो और न्यायालय में मामला पहुंचे तो फैसला आते-आते 14-15 साल तो बीत ही जाते हैं... उस पर भी अगर फैसला आ भी गया तो आप हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगा सकते हैं... प्रियदर्शिनी मट्टू जैसे ऐसे कई केस ऐसे ही हैं... ये तो रेप की बात हुई... छेड़छाड़ तो यहां बहुत छोटी और आम बात मानी जाती है... उसे करना तो लड़के अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं... हां लड़कियों को ये समझाइश जरूर दी जाती है... कि कपड़े ऐसे पहनो... तो ऐसे मत चलो... तो ऐसे मत बोलो... etc..
ये तो रही रेप और छेड़छाड़ की बात... लेकिन हत्या, अपहरण जैसे अपराध करने वाले अपराधी भी अपने देश में खुलेआम घूमते हैं... वो भी शान से... यहां तक कि जनप्रतिनिधि तक बन जाते हैं...
हमारा देश स्त्रियों की पूजा करने का दंभ भरता है... और कहता है कि यहां जो विकृति आई है वो पश्चिमी सभ्यता की देन है... लेकिन सच तो ये है कि यहां कुछ परसेंट घरों को छोड़ दें तो कहीं भी स्त्री का सम्मान नहीं है... लोग जिस दिन दुर्गा पूजा करते हैं... उस दिन भी बीवी को गलियाते हैं... मारते-पीटते हैं... यहां तक कि दिल दुःखाने वाली बातें सुनाते हैं... एक तरफ तो पूजा का आयोजन करते हैं... दूसरी तरफ अश्लील बातें करते हैं किसी लड़की के बारे में... जिस बहू-बेटी को लक्ष्मी का रूप माना जाता है... उसे कष्ट पहुंचाने में परिवार वाले कोई कोरकसर नहीं छोड़ते... इतनी इज्जत करते हैं महिलाओं कि आज हर मां-बाप को ये सोचना पड़ रहा है कि बेटी को कहां-कहां दरिंदों से बचाते चलें... और सबसे बड़ी बात तो ये कि दरिंदा कहीं परिवार में ही न हो...
सबसे आश्चर्य की बात तो ये है कि कोल्हापुर में जिस मंदिर में मां लक्ष्मी की पूजा की जाती रही है बरसों से वहीं महिलाओं का प्रवेश कुछ दिनों पहले तक वर्जित था... क्या औरतों को मां के मंदिर में जाने से रोककर उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती थी?
ये सब कोई आज पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से हुआ हो... ऐसा बिल्कुल नहीं है... शुरू से ही हमारे देश में भ्रष्टाचार की और औरतों के प्रति अन्याय की कमी नहीं रही है... कहा जाता था कि स्त्रियों को वेद मत सुनने दो... अगर सुन ले तो उसके कान में पिघला शीशा डाल दो... जबकि सभी भगवान और देवता खुद ही देवियों की पूजा करते हैं, उनकी इज्जत करते हैं, और उन्हें दुःख नहीं पहुंचाते... फिर भी भगवान की कहानी पढ़कर भी बेवकूफ लोगों को समझ में नहीं आता... कि बिना स्त्री कृपा के जीवन में तरक्की नहीं की जा सकती... एक तरफ तो देवियों को पूजा करो... दूसरी तरफ स्त्री रुपी देवी को दुत्कारो.. पहले भी औरतें उठा ली जाती थीं... परदे में दुराचार होता था...बाल विवाह होते थे... सती प्रथा थी.. मारना-पीटना था... चाहे बेइज्जत करना था... चाहे दहेज प्रथा थी... या औरतों को बच्चा पैदा करने की मशीन के तौर पर बिहेव करने की थी... और तुलसीदास ने तो यहां तक कह दिया कि औरत तारण की अधिकारी है... जिस स्त्री के गर्भ में 9 महीने रहे... उसे भी नहीं छोड़ा...उसकी ममता को और सबसे बड़ी बात तो कि अपने वजूद को ही गाली दी... अब उस समय तो ग्लोबलाइजेशन था नहीं कि इंटरनेट के माध्यम से तुलसीदास जी ये बात पश्चिमी देशों से सीख लिए हों...
कुल मिलाकर हमारे देश में स्त्रियों के प्रति अत्याचार कोई नई बात नहीं... सबसे अफसोस की बात तो ये है कि औरतों को दबाकर रखना आज भी गौरव का विषय समझा जाता है... लेकिन उससे भी ज्यादा अफसोस तो इस बात पर है कि औरत स्वयं ही इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है... उस पर से न उसके साथ समाज है, न परिवार और न कानून या न्याय प्रणाली...
तलाक : जिम्मेदार कौन?
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पिछले दिनों अपने एक दोस्त की धर्मपत्नी से इन्टरनेट पर मुलाक़ात हुई जिसकी शादी मैंने और मेरे ही दोस्तों ने मिलकर आर्य समाज मंदिर में करवाई थी.बड़े आदर के साथ जब मैंने उन्हें नमस्कार कर पुछा की भाभी आप कैसी हैं तो अचानक उनकी जो उग्र प्रतिक्रिया थी वो मेरे समझ से परे थी..उनके शब्दों के बाण मुझे ऐसे लग रहे थे जैसे मैंने भाभी कह कर उनका अपमान कर दिया हो..”मैं कमाती हूँ और किसी भी तरह की पाबन्दी सहन करना न मेरी मजबूरी है न ही आदत..आखिर कोई और मेरे जीवन पर नियंत्रण कैसे रख सकता है? मैं केवल घर बैठ कर बच्चे नहीं पैदा कर सकती.. इसलिए मैंने तलाक ले लिया है ताकि अपने ढंग से जीवन जी सकूँ..”कितनी विडंबना वाली बात है की रीतू ने अपने पति को “कोई” का दर्जा दे दिया..और उसे ही अलगाव का जिम्मेदार भी मान लिया.... पहले पति-पत्नी शादी को जन्म जन्मांतर का रिश्ता मानते थे.एक दूसरे से अलग होने की बात वो सोच भी नहीं सकते थे..बदलती जीवन शैली और औरत की बढती महत्वकांक्षाओं के चलते जिंदगी में जटिलता आ गई है.. नतीजन भौतिकवादी संस्कृति के तहत यह रिश्ता अपनी अहमियत खोता जा रहा है और अदालतों में सम्बन्ध तोड़ने के मामले बढते जा रहे हैं..औरत अपनी सामाजिक मान्यताओं को नज़रअंदाज़ कर रही है.केवल पति ही शादी-शुदा जिंदगी में आने वाली कटुता, अलगाव या तलाक का जिम्मेदार होता है ये कहना आज के संदर्भ में सही नहीं बैठता..औरत न तो अब अबला रही है न असहाय या पति पर निर्भर..इसलिए तलाक के लिए पत्नी भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना की पति..आज के आकड़ों पर नज़र डालें तो नज़र आएगा की आज पुरषों की अपेक्षा महिलाएं तलाक के लिए ज्यादा पहल करती है...और इनमें अधिकतर वो महिलाएं हैं जो युवा,आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर या आज़ादी पसंद हैं..ये औरतें परंपरा या परिवार के नियम कायदों को मानने के बजाय खुद की संतुष्टि और खुशी को ज्तादा महत्त्व देती हैं..अहम ने औरत के अंदर जन्म ले लिया है” मैं कमाती हूँ ? मैं सक्षम हूँ तो घर का काम क्यूँ करूँ ? मैं भी थकी हारी ऑफिस से आती हूँ तो पति की चाय क्यूँ बनाऊं? आदि ऐसे कई सवाल हैं जो आज की कामकाजी महिला की ज़बान हरदम रहते हैं...आज का युगल तलाक को एक समाधान की तरह देखने लगा है.. अधिकतर मामलों में अब पहल औरत की तरफ से होने लगी है..बेहतर शिक्षा,अच्छा वेतन और कार्यक्षेत्र में अर्जित सम्मान ने औरत को पुरानी स्थितियों को नए परिप्रेक्ष्य में देखने को प्रेरित कर दिया है..यही वजह है की उसमें जहाँ सहनशीलता की कमी आयी है वहीँ वह किसी तरह का समझोता करने को भी तैयार नहीं है..आर्थिक स्वतंत्रा ने औरत को एक तरह से बागी और अहंकारी बना दिया है.. जिसकी वजह से रिश्ते अगर उसकी राह में आते हैं तो रिश्तों से खिलवाड़ करने में उसे देर नहीं लगती..औरत जिम्मेदार इसलिए भी है क्यूंकि बदलाव उसमे आया है, औरत में आई सहनशीलता की कमी परिवारों को ताड़ने में सबसे बड़ी वजह बन गयी है, वो तो स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बन गयी है, पुरुष तो अभी भी अपनी पुरानी मानसिकता के दायरे से बहार नहीं निकल सका है जिसकी वजह से मतभेद बढ़ रहे हैं...और इसके लिए पति ही जिम्मेदार है ये कहना कहाँ तक न्यायसंगत है?..देर से शादी करना और अपने करियर को प्राथमिकता देना, अपने जीवन से जुड़े फेसले खुद लेना,इन्टरनेट और पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव जैसी हर चीज़ ने औरत की शादीशुदा जिंदगी से जुडी अपेक्षाओं को बड़ा दिया है.. आर्थिक सुरक्षा से उपजे आत्मविश्वास में अहम इस हद तक शामिल हो गया है की औरतें शादीशुदा जिंदगी की मुश्किलों को सुलझाने की बजाये तलाक का रास्ता अपना रहीं हैं.तलाकशुदा औरत को लोग किस नज़र से देखेंगे, इस की भी उसे परवाह नहीं है, क्यूंकि उसे तो अपनी आज़ादी से प्यार है और इसलिए वो शादी जैसे अटूट रिश्ते को भी तोड़ने में पलभर तक नहीं लगाती..एक समय था जब शादी करना ही औरत की प्राथमिकता और सोशल स्टेटस होता था, पर आज स्थति बिलकुल विपरीत है ...पति अगर उसकी नहीं सुनता या उसके हिसाब से नहीं चलता तो वह उस से तलाक लेने की बात करते हुए न तो समाज को परवाह करती है न परिवार के सम्मान की ....
अमन का आगाज़
अपनी खुशी पर भी दें ध्यान
आखिर ऐसा क्यों हुआ... उनके माता-पिता की मौत के बाद अनुराधा (बड़ी बहन) ने अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल का जिम्मा लिया... ये अच्छी बात है कि आप अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं और उसे निभाते भी हैं... लेकिन मेरा ये भी मानना है कि अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में इतना इन्वॉल्व नहीं होना चाहिए... कि खुद को ही इंसान भूल जाए... कोई भी चीज आपके खुद के ऊपर न हावी हो जाए...
अनुराधा सीए थी... उसने भाई-बहनों को पढ़ाया... लायक बनाया... लेकिन जब उसकी जिम्मेदारियां पूरी हो गईं... तो क्या उसे अपनी शादी के बारे में नहीं सोचना चाहिए था... सोनल (छोटी बहन) भी सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल थी... तो क्या उसे भी कोई लड़का नहीं मिल रहा था... भाई विपिन सबसे छोटा था... लेकिन दोनों बहनों ने उसकी शादी सबसे पहले 2007 में करा दी... भाई को भी ये सोचना चाहिए था... और बहनों को भी इस बारे में मनाना चाहिए था कि जितनी रेसपॉन्सिबिलिटी आपको निभानी थीं... आपने निभा लीं... अब पहले आप दोनों बहनों की शादी होनी चाहिए... लेकिन भाई ने भी इसके लिए दिल से कोशिश नहीं की होगी...
ये बहुत बड़ी सच्चाई है औरतों की... कि उनके लिए 30-35 के बाद घर बसाने के लिए जीवनसाथी मिलना अपने समाज में काफी कठिन होता है... कुदरत ने भी मर्द और औरत में, उसकी शारीरिक संरचना में फर्क किया है... जहां कोई लड़की 30 के बाद ढलने लगती है (मेडिकली प्रूव) वहीं लड़के 30 के बाद भी लड़कियों के मुकाबले यंग होते हैं... लड़कियां बड़ी भी जल्दी होती हैं... और लड़के देर से... इसलिए पहले के जमाने में लड़की और लड़के की शादी में दोनों की उम्र में थोड़ा अंतर रखा जाता था... 35से ऊपर की औरत आंटी होती है... जबकि लड़का भइया... लड़की की शादी 35 के ऊपर आश्चर्य या अफसोस का विषय होता है... जबकि लड़के के लिए ये चीज सामान्य मानी जाती है... लड़के के लिए लड़की किसी भी उम्र में मिल जाती है... विधुर हो तो मिल जाती है... तलाकशुदा हो तो मिल जाती है... लेकिन लड़कियों के लिए इन मामलों में काफी मुश्किल होती है... इस सच्चाई को समझना चाहिए...
अनुराधा और सोनल के साथ यही हुआ... माता-पिता की मृत्यु, कोई पुरुष दोस्त नहीं (जिसकी एक उम्र के बाद जरूरत होती है), भाई की शादी... और अलग रहने के लिए चले जाना... इन सबसे ये दोनों टूट गईं... उन्हें लगा कि अब उनाक क्या होगा... कौन सहारा होगा... किसके भरोसे जीएंगी... अच्छे पदों पर रहते हुए एक भावनात्मक असुरक्षा के घर कर जाने की वजह से और लगातार हादसों के कारण वे टूट गईं... और खुद को घर के अंदर बंद कर लिया...
जहां तक भाई और उसकी पत्नी का पक्ष देखें... तो भाई की पत्नी यानी भाभी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता... कोई भी लड़की जब शादी करती है... तो नई-नई शादी में पति का पूरा साथ चाहती हैं... उसके सपने होते हैं... और अगर मैंने अपने भाई के लिए कुछ किया है... तो हम भाई से उम्मीद कर सकते हैं... कि वो मुझे समझे... लेकिन दूसरे घर की बेटी... जिसने ये सब महसूस नहीं किया है... उससे हम इन सबको समझने की उम्मीद नहीं कर सकते... पर्सनली मेरा ये मानना है कि अनुराधा और सोनल चूंकि अकेली थीं... अपनी दुनिया उन्होंने भाई के आसपास ही बना रखी थी... शादी तो कर दी भाई की... लेकिन अचानक से किसी और लड़की का अधिकार भाई पर हो जाना... और उसके हर फैसले किसी और द्वारा लिया जाना... उन्हें जरूर खला होगा (सास-बहू के झगड़े और ईर्ष्या की सबसे बड़ी वजह)... इसके लिए आए दिन तनाव और मनमुटाव होते रहे... जहां तक भाई की बात है... शादी के बाद लड़का न तो पूरी तरह अपने घरवालों का पक्ष ले सकता है न बीवी का... और शादी के बाद पत्नी के प्रति उसकी जिम्मेदारियां नो डाउट ज्यादा होती हैं... क्योंकि पत्नी कंपलीटली उसपर डिपेंड होती है... इन्हीं सब वजह से विपिन अपनी पत्नी के साथ अलग हो गया... और अनुराधा और सोनल डिप्रेस हो गईं... वो हार गईं जिंदगी से... शायद परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते...
मेरी एक फ्रेंड है... जिसके ऊपर भी उसके परिवार की जिम्मेदारियां हैं... उसे एक लड़का प्यार करता था... और शादी करना चाहता था... लकिन वो निर्णय नहीं ले पा रही थी... अक्सर मुझसे पूछती थी कि कैसे अपने भाई-बहनों को छोड़कर शादी कर ले... लेकिन मेरा यही कहना था... कि तुम्हारे भाई-बहन 20 साल से बड़े हो चुके हैं... उन्हें अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए... खासकर भाई को जो 22 साल का है... अब वे इतने छोटे नहीं कि खुद को संभाल न सकें... और कोई जरूरी नहीं कि शादी के बाद तुम उन्हें नहीं संभाल सकतीं... शादी के बाद भी मदद की जा सकती है... उनकी जिम्मेदारियों को पूरा किया जा सकता है... जो लड़का तुमसे प्यार करता है... वो इन चीजों को जरूर समझेगा... वो तुम्हारा साथ जरूर देगा... तुम लड़के के सामने सबकुछ क्लीयर कर दो... और भगवान की कृपा से मेरी दोस्त आज एक सुखी वैवाहिक जीवन जी रही है... और अपने परिवार की मदद भी कर रही है...
अनुराधा और सोनल को क्या मिला ये सब करके... बाकी सब लोग तो अच्छे ही रहे... इधर अच्छी खासी दोनों लड़कियों ने खुद को हड्डी का ढांचा बना लिया... दुनियाभर की बीमारियों का घर बन गया उनका शरीर... इससे फर्क किसे पड़ा... केवल उन दोनों को... बाकी दुनिया अफसोस जताएगी, खुद मैं कुछ दिनों या सालों बाद भूल जाऊं कि कौन अनुराधा या सोनाली... लेकिन दुनिया किसकी चली गई... उन दोनों की... इसलिए किसी के लिए खुद को खोने की जरूरत नहीं... प्यार ऐसा करें जो कन्सट्रक्ट कर दे... डिस्ट्रक्ट नहीं...
इसलिए खुद को रिश्तों के भंवर जाल में ज्यादा नहीं फंसाना चाहिए... खुद के लिए भी थोड़ा स्वार्थी होना चाहिए... (जिसमें दूसरों की जिंदगी न बर्बाद होती हो), खुश रहना चाहिए... और अपनी खुशियों के बारे में भी सोचना चाहिए... क्यों कि लोग तो केवल छीनने के लिए बैठे हैं... चाहे वो कोई भी हो... अपने बारे में खुद ही सोचना होगा... जो खुद अपनी खुशी के बारे में नहीं सोच सकता ... उसके बारे में दूसरा क्यों सोचेगा... इसलिए थोड़ा स्वार्थी हों... और खुश रहें... भाई-बहन से उम्मीद ज्यादा नहीं रखनी चाहिए... क्योंकि सबके अपने परिवार हैं... उन्हें उनके बारे में भी सोचना है... इसलिए अपना घर भी बसाएं...
Tonight when the Giants will Sleep-Dreams of Sir Sachin and Ponting
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कुछ दिल से....
रोमल भावसार
तुझे सलाम...
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