फेरबदल का फेर



अरी ओ मुन्नी की मां, कहां हो ? और अपनी लाडली बिटिया कहां है ? क्या हुआ ? मुन्नी पढ़ाई कर रही है । अगले महीने सरकारी नौकरी का जो एग्जाम है उसी की तैयारी कर रही है अपनी लाडो और हां, एक बात और सुन लो तुम वक्त बेवक्त मेरी बिटिया को पढ़ाई के समय डिस्टर्ब न किया करो। लो जी कर लो बात, भलाई का तो जमाना रहा ही नहीं । मैं कहां मुन्नी की बेहतरी के लिए बेचैन हो रहा हूं, और मुन्नी की मां मुझ पर ही खा-म-खा गुस्सा हो रही है। अच्छा अब जलेबी की तरह घुमावदार बातें न करो । क्यों हाय तौबा मचाए हो बताओ ? पहले मुन्नी को बुलाओ ? जो मुझे कहना है वो लाडो ही समझ सकती है, लाडो की अम्मा नहीं । क्या हुआ मां, क्या हुआ पापा ? अरे बिटिया एक बार फिर से मनमोहन के मुकुट के कुछ मोती बदल गए हैं । पापा...मनमोहन तक तो समझ में  आ गया पर ये मुकुट और उसके कुछ मोती से आपका क्या मतलब है ? अरे मेरी भोली भाली लाडो। अगर सरकारी नौकरी कर ई युग में तू तरक्की की ख्वाहिश रखती हो तो जरा मेरी जलेबीदार बातों को समझा करो, आगे काम आवेगा । मुकुट और मोती का अर्थ है मंत्रिमंडल और मंत्री। एक और रट्टा मार लो कि, मंत्रिमंडल में कुछ मोती को प्रमोशन मिला है और कुछ का डिमोशन हुआ है, और जिन मोतियों की चमक फिकी पड़ गई थी , उसे आंगन की रखवाली के लिए बुला लिया गया है। यानी पापा...अब फिर से मुझे मुकुट के कुछ नए मोतियों के नाम और पोर्टफोलियों को याद करने होंगे । पर पापा...एक बात बताओ कि, जब पिछली बार मनमोहन सिंह ने कैबिनेट का विस्तार किया था तो वो बोले थे कि, आखिरी बदलाव है । तो फिर ऐसा क्या हो गया, जो उन्हें अपनी बातों से पलटना पड़ा । प्रश्न तो तुम्हारा बहुत ही जायज है बिटिया, पर तुम अपनी जेहन में एक बात अच्छी तरह बिठा लो कि, गाड़ी का पहिया (चक्का) और सफेदपोशों की जुबान जितनी बार पलटे, अच्छा माना जाता है। तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि, इस बार भी पिछली बार की तरह अपने प्रधानमंत्री महोदय ने इसे 2014 तक के लिए आखिरी बदलाव बताया है। मुन्नी के पापा...वो अपने राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी मनमोहनी मुकुट के मोती बने की ना ही ? मेरी भाग्यवती राहुल में बड़ी दिलचस्पी है तुम्हारी ? बात दिलचस्पी की नहीं है जी। वो पिछले दफे मैंने कैबिनेट विस्तार के बाद टीवी पर मनमोहन सिंह को ये कहते सुना था कि, राहुल के मंत्रिमंडल में नहीं शामिल होने के फैसले से वो बहुत आहत हैं और आप भी तो कहते थे, लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी मंत्री बनेंगे । भाग्यवान तुम्हारी बातें सौ फीसदी सही हैं पर त्रासदी देखो, इस बार भी मनमोहन सिंह ने मुकुट में नए नवेले मोतियों को जड़ने के बाद यही कहा है कि, आम चुनाव से पहले का ये आखिरी बदलाव है । साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि, राहुल के उनके मुकुट के मोती नहीं बनने का उन्हें बेहद मलाल है । अच्छा पापा...तो कैबिनेट में इस बार राहुल की छाप दिखी की नहीं ? बिटिया ये सब सियासी बातें हैं । इक्का दुक्का चेहरों को छोड़, मुझे तो कोई नहीं राहुल की टीम का नजर आता है। हां एक बात जो मुझे लग रही है, वो ये कि, सब के सब गांधी फैमिली के वफादार हैं। कुल मिलाकर ये समझ लो मनमोहन रूपी पुरानी बोटल में सोनिया और राहुल रूपी मदिरा का कॉकटल भरा गया है और इसी की बदौलत भारत को समझने वाले राहुल रूपी कांग्रेस के तथाकथित युवराज 2014 में सत्ता की कुर्सी का लगाम अपनी हाथों में लेना चाहते हैं । खैर बिटिया फिलहाल तो तुम अपडेट हो जाओ, क्या पता अगले एग्जाम में मुकुट के मोती से जुड़े कुछ प्रश्न आ जाए ? और लाडो की मां तुम भी इस फेरबदल के फेर में न ही उलझो तो अच्छा होगा, क्योंकि सियासत में लकीर सीधी नहीं ढेढ़ी-मेढ़ी होती है । चलो चाय बनाओ। अदरक डाल के।

'फना' हो गया 'मोहब्बत का महताब'



" तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं, वफा कर रहा हूं वफा चाहता हूं "  "वो मेरे पति हैं और वो मेरा प्यार है"   "मैं उससे बेपनाह मोहब्बत करती हूं और उसके लिए मैं करोड़ों की दौलत को लात मार सकती हूं"  "तुम उससे प्यार करते हो, तो फिर तुमने बिना इजहार किए ही ये कैसे सोच लिया कि, वो तुम्हें नहीं चाहती"   "पापा मैं आपसे झूठ नहीं बोल सकती और उसके प्यार के बगैर मैं जिंदा नहीं रह सकती" "नयनों के काजल से बादल में रंग भरने वाले"  ये सोच या फिर ये कहें कि,ये अल्फाज उस शख्स के हैं, जिसने दुनिया को मोहब्बत के हर उस पहलू से रु-ब-रु कराया । जिसे हर आम और खास अपना महसूस करता रहा और आगे भी करता रहेगा । आप समझ ही गए होंगे कि, मैं रोमांस के राजा, किंग्स और रोमांस, मोहब्बत के महताब और न जाने कितने उपाधियों से पुकारे जाने वाले मशहूर निर्माता-निर्देशक यश राज चोपड़ा की बात कर रहा हूं। कहते हैं वक्त अमूमन किसी का साथ नहीं देता और दाग अच्छे नहीं होते । मगर यश जी बॉलीवुड में शायद पहले ऐसे शख्स हुए जिनका वक्त ने पहले कदम पर साथ भी दिया और लोगों को दाग भी अच्छे लगने लगे । कल्पना की माया को वास्तविकता में परिणत करना हो, या फिर दो नायिकाओं के बीच में नायक को सामंजस बिठाने की बात । नायक को निगेटिव किरदार देकर मोहब्बत का मसीहा बना देना और एक अदने से इंसान को एंग्री यंग मैन की छवि में ढाल देना । कुछ ऐसी ही प्रतिभा के धनी थे भारतीय सिनेमा के यश । मोहब्बत है क्या चीज ? ये एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब बॉलीवुड में हर किसी ने अपने तरीके से दिया है लेकिन जितने अंदाज मोहब्बत को रुपहले पर्दे पर निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा ने परिभाषित किया अभी तक कोई और नहीं कर पाया है । फिल्म दाग से प्यार की कहानी को पर्दे पर उकेरने का सिलसिला जिस जोशीले अंदाज में यश साहब ने शुरू किया और जिस बखूबी से उन्होंने मोहब्बत से जुड़ी हर सवाल का दिया । उसे जब तक है जान भूला पाना नामुमकिन है । यश चोपड़ा ने बॉलीवुड में रोमांस का ऐसा ताना बाना बुना कि, भारतीय सिनेमा में यश चोपड़ा लब्ज का इजाद हो गया । यश जी ने न सिर्फ मानवीय प्रेम को ही पर्दे पर उतारा बल्कि,प्रकृति की सौंदर्य के प्रति भी लोगों का फिल्मों के जरिए लगाव बढ़ाया । सिनेमाई जगत में जब भी पीली सरसों की खेत और स्विट्जरलैंड की हसीन वादियां का जिक्र होगा । यकीन मनिए तब तब यश की चर्चा होगी ।  वक्त के साथ मोहब्बत के इस महताब ने जो सिलसिला शुरू किया वो थम जरूर गया है, पर जब तक है जान उन्हें भुलाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है । क्योंकि मोहब्बत के महताब मरा नहीं करते फना होते हैं । हमेशा अपनी विचारों से लेखन का अंत किया जाता है, मगर इस लेखन का अंत मैं यश साहब के उस अल्फाज और संवाद से करना चाहता हूं जो उनके हैं सिर्फ उनके ।
" तेरी आंखों की नमकीन मस्तियां
तेरी हंसी की बेपरवाह गुस्ताखियां
तेरी जुल्फों की लहराती अंगराइयां
नहीं भूलूंगां मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"तेरा हाथ से हाथ छोड़ना
तेरा साथों का रूख मोड़ना
तेरा पलट के फिर न देखना
नहीं माफ करूंगा मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"बारिशों में तेर बेधड़क नाचने से
बात बात पर बेवजह तेरे रुठने से
छोटी छोटी तेरी बचकानी बदमाशियों से
मोहब्बत करूंगा मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"तेरे झूठे कसमें वादों से
तेरे जलते सुलगते ख्वाबों से
तेरी बेरहम दुआओं से
नफरत करूंगा मैं
जब तक है जान,जब तक है जान"
"मेरी ढेढ़ी मेढ़ी कहानियां
मेरी ढेढ़ी मेढ़ी कहानियां
मेरे हंसते रोते ख्वाब
कुछ सुरीले बेसुरे गीत मेरे
कुछ अच्छे बुरे किरदार
वो सब मेरे हैं,वो सब मेरे हैं
तुम सब में मैं हूं
बस भूल मत जाना
याद रखना मुझे सब
जब तक है जान,जब तक है जान


संकट में लाड़ली


एक तरफ मध्य प्रदेश सरकार बेटियों को बचाने और लाडलियों को लक्ष्मी बनाने पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं। बेटियों की शादी के लिए मुख्यमंत्री कन्यादान योजना लागू है। लेकिन अब यही लाडलियां संकट में आ गई हैं। हालात ये हैं कि गांव हो या कस्बा, शहर बड़ा हो या छोटा, इलाका आबाद हो या सुनसान... लाडलियां हर जगह बदमाशों के निशानों पर हैं। जी हां ये हकीकत केवल हमारी जुबानी नहीं, बल्कि हैवानियत की उन तमाम कहानियों से भी बयां होती हैं, जिन्होंने हर खास और आम को झकझोर कर रख दिया है। हालात ये हैं कि अब तो प्रदेश की राजधानी में भी लाड़लियां महफूज नहीं रह गईं हैं। भोपाल के अरेरा कॉलोनी में भी परिचित बनकर दगा देने वाले मुस्तफा ने भी कुछ ऐसा ही किया। मुस्तफा ने अपने साथी के साथ मिलकर 10 वीं की छात्रा का पहले तो अपरहण किया, फिर उसे दरिंदगी का शिकार बनाया और फिर हत्या तक कर डाली। इससे पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसने लाड़लियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
28 सितंबर 2012, इंदौर में 6 साल की मासूम की दर्दनाक मौत, सौतेले मां-बाप ने दीवार पर फेंककर की हत्या... 21 सितंबर 2012, जबलपुर में छात्रा का MMS, अश्लील सीडी बनाकर ब्लैकमेल करने का मामला... 18 फरवरी 2012, इंदौर में दो युवतियों से गैंगरेप, अश्लील MMS बनाकर किया सार्वजनिक
ये तो महज वो मामले हैं जो ताजा है और लोगों के जेहन में जिंदा भी है। अगर आंकड़ों की बात करें तो मध्य प्रदेश में एक जनवरी 2012 से 20 जून 2012 तक यानी 170 दिनों में कुल 1,687 महिलाओं की आबरू तार-तार हुई। जिनमें 858 नाबालिग हैं, यानी हर दिन 5 लाडलियों को प्रदेश में कहीं-न-कहीं ज्यादती का शिकार होना पड़ रहा है।
प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने विधानसभा में एक प्रश्न के जवाब में जो जानकारी दी, ये आंकडे उन्हीं की बानगी है। इतना ही नहीं NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश में साल 2011 में बलात्कार के कुल 24,206 मामले सामने आए। और यहां भी बलात्कार के मामलों में मध्य प्रदेश सबसे आगे रहा। जहां 1,262 मामले दर्ज हुए। बहरहाल इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश में लाड़लियां कितनी सुरक्षित हैं। ये आंकड़े किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता की बात भी हैं और गुस्से की वजह भी। महेश मेवाड़ा पत्रकार