ये कैसा प्यार ?

कुछ बातों पर यकीन करना चाहूं तो भी नहीं कर पाती...कुछ लोगों के बदलाव को देखूं तो भी यकीन नहीं
होता...सोचती हूं क्या वाकई दुनिया बदल गई...क्या रिश्तों के मायने अब नया रूप अख्तियार कर चुके हैं
...अब तक बॉलीवुड और टीवी सीरियल में इस तरह की स्टोरी देखकर लगता था कि क्या ऐसा दुनिया में होता
होगा...फिर सोचा ग्लैमरस लाइफ के लिए ये बात मायने नहीं रखती लोग कपड़ों की तरह रिश्ते बदलते है...और टीवी सीरियल में तो लोगों के मनोरंजन या टीआरपी के चक्कर में काल्पनिक तौर पर बनाया जाता होगा ...पर अब तो अपने आस-पास के लोगों को देखकर लगता है कि वाकई फिल्म वालों को भी स्टोरी हमारे बीच के लोग ही देतें हैं...आज 'प्यार' शब्द पर ही बात कर लें क्योंकि सारे रिश्ते और शब्दों पर बात करें तो उलझ सी जायेंगी...'प्यार' ये शब्द सुनते ही मन एक सुंदर सी भावना के आसपास घूमने लगता है...जिसमें त्याग, समर्पण, ईमानदारी जैसे भावों का समावेश हुआ करता था...प्यार का नाम सुनते ही याद आते थे वो कुछ लोग जो जाति-धर्म,ऊंच-नीच,अमीरी-गरीबी से परे एक दूसरे की परवाह के लिए अपनी जान तक दे चुके हैं...शायद सब जानते हैं हीर-रांझा,शीरी-फरहाद,लैला-मजनू को...पर आज के प्रेमी शायद इनकों बेवकूफ कहें तो चौंकियेगा मत...क्योंकि अब तो लोग प्यार को जीत-हार और जिंदगी के लिए सुख बटोरने का माध्यम बना
चुके हैं,हीर ना मिली तो क्या दुनिया में हीर की कमी है ,रांझा न मिला तो क्या.. अरे उससे अच्छा रांझा भी आस-पास ही मिल जाएगा...रही बात कसमे-वादे की जो साथ निभाने के लिए हर प्रेमी एक दूसरे से करते हैं..साथ में सारी हदे फिर वो चाहे मन की हो या तन की पार करने के बाद भी उसे सामान्य करार देकर आगे निकल पड़ते हैं... जैसे वो किसी नाटक के संवाद से ज्यादा कुछ भी नहीं था..जो एक नाटक खत्म होने के साथ ही खत्म हो जाता है....और जिंदगी में नए प्रेमी-प्रेमिका के बदलते ही बदल जाता हैं...इतना तो फिर भी ठीक है साहब पर आज तो एक साथ कई लोगों से प्यार निभाते देखा जाता है और फिर जो बेहतर मिलता है अपनी जरूरतों के हिसाब से उसे बड़े नाटकीय अंदाज में जीवन साथी भी चुन लिय़ा जाता है...तमाम पाकिजगी और आंखों में शर्मों हया की दुहाई के साथ...और ना तो प्रेमी को फर्क पड़ता है धोखा देने का ना ही प्रेमिका को फर्क पड़ता नए के साथ हो लेने का...क्या कहिएगा इसे बॉलीबुड की फिल्मी स्टोरी..जी नहीं ये हकीकत है आज के समय की.. जिसकी झलक अब छोटे-बड़े शहरों में आसानी से देखी जा सकती है...आज के समय में रिश्तों की गरिमा,गंभीरता,ईमानदारी,संघर्ष की बात करिए तो जो युवा आपके पास होंगे वो जरूर आपको पुराने जमाने का कह कर आपको आउटडेटेड कहने से नहीं चूकेंगे...और आपको खुद शर्म आएगी अपनी सादगी और ईमानदारी पर....और मुश्किल तो यही है कि सुख की परिभाषा भी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती देख पाएंगे आप..मेरी सोच में तो ये प्यार नहीं.. आप क्या सोचते हैं ? इस बारे में.....ये बदलाव कहां ले जाएगा दुनिया को....रिश्तों कों...या अब यही पहचान होगी रिश्तों की जिससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा...झूठ ,फरेब,चापलूसी.धोखा,जीत हार का गणित,भ्रस्ट आचरण,छल-कपट ही शायद इस युग की पहचान मानी जायेगी..क्योंकि हर युग की अपनी विशेषता होती है ,लोगों के जीवन मूल्य,नैतिक मूल्य होते हैं..तो यही समझें कि वाकई कलयुग नें अपना असर
दिखाना शुरू कर दिया है....

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