सुसाइड और सियासत



मैं अंदर से बिखर चुकी हूं। लिहाजा मैं अपनी जिंदगी खत्म कर रही हूं। मेरा भरोसा टूट चुका है। मेरे साथ धोखा हुआ है ये अल्फाज भले ही इस दुनिया से रुखसत होने से पहले पूर्व एयर होस्टेस गीतिका ने अपने लिए लिखे, लेकिन देश जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें उसके ये चंद लफ्ज बिलकुल सटीक हैं। गीतिका के सुसाइड नोट में लिखे इन शब्दों को अगर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों के साथ तालमेल बिठाने कोशिश करें तो, पता चलेगा कि, एक लड़की जहां सियासतदां के चंगुल में फंसकर मौत के आगोश में जाने को मजबूर हो गई, वहीं अन्ना के सहयोगी सियासी मैदान के खिलाड़ियों की हठधर्मी के चलते सियासत के दलदल में फंसने को बेताब हैं। मोहब्बत और जुनून में जब तक स्वार्थ नहीं, दोनों सरपट दौड़ती है, लेकिन ज्योंहि इसमें स्वार्थ का घालमेल होता है, तो दर्दनाक और खौफनाक अंजाम होना लाजिमी हो जाता है। आसमान में उड़ते वक्त अपने मुस्कान से दूसरों को खुश करने वाली गीतिका के होठों की यही अदा गोपाल कांडा को भा गई, उसने आसमान में मुस्कान बिखेरने वाली उस लड़की को अपने दिल में कैद करने के पैंतरे चले, गीतिका उसकी चाल को जब तक समझ पाती तब तक वो फंस गई थी। यहां इस बात में भी दो राय नहीं है कि, गीतिका के मन में भी ये ख्याल आया होगा कि, एयरलाइन्स के मालिक के करीब जाने से उसकी मुस्कान घरेलू उड़ान से अंतर्राष्ट्रीय उड़ान में तब्दील हो जाए। यानी एक को तरक्की चाहिए होगी, और दूसरे को आदत के मुताबिक, एक तरोताजा जिस्म। दोनों के संबंधों में मतलबी प्यार की बूं छिपी थी, जो गीतिका को मौत के मुहाने पर ले जाती है, और कांडा को सलाखों के नजदीक। मोहब्बत के फंसाने के बाद बात की जाए जुनून की। मजबूत जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों ने जबरदस्त जुनून का परिचय देते हुए 16 महीने पहले एक बदलाव की चिंगारी रामलीला मैदान पर जलाई, भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता को उस चिंगारी में एक साफ तस्वीर नजर आई, सरकार भी हिल गई। असर ये हुआ कि,13 दिनों के अनशन में ही बिल सदन में पेश कर दिया गया। भरोसे के बल पर अन्ना ने 13 दिन बाद अनशन खत्म किया। उन तेरह दिनों के सफर में कई ऐसे ठहराव आए जहां पर अन्ना और उनके सहयोगी ये कहते नजर आए कि, राजनीति में वो कभी कदम नहीं रखेंगे। आंदोलन के जरिए देश को एक नई दिशा देंगे। देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से शुरु हुआ अनशन मायानगरी मुंबई के आजाद मैदान पहुंचा,कहते हैं मुंबई की चकाचौंध भरी जिंदगी है, और जो इसमें रम जाए वो तो ठीक है,लेकिन जो नहीं रमा, उसका सर्वनाश या कहें कि,चकाचौंध में खो जाना निश्चित है। ऐसा ही हुआ अन्ना और उनके सहयोगियों के साथ। जनता का साथ उम्मीद से कम मिला। वजह साफ है, जिस आंदोलन की शुरुआत मजबूत जनलोकपाल के एकल लक्ष्य को लेकर हुआ, वो बहुउद्देश्यीय बन चुका था, खुद अन्ना और उनके सहयोगियों ने देश के हर मुद्दे पर मीडिया में बयानबाजी शुरू कर दी। ये सभी भूल गए कि, बहुत बोलने वालों को यहां भाव नहीं दिया जाता। हिम्मत करके अन्ना ने आंदोलन को फिर से दिल्ली ले जाने का फैसला किया, इस बार जंतर-मंतर पर पड़ाव बनाया। यहां पर बड़बोलेपन का नतीजा हम सबने देखा। जंतर-मंतर को भूल-भुलैया भी कहा जाता है। इसीलिए शायद अन्ना और उनके सहयोगी यहां पर भटक गए। राजनीति नहीं करने की दुहाई देने वाले सियासत के समंदर में डूबकी लगाने को तैयार हो गए और आंदोलन पर सियासत का कफन चढ़ाने को तैयार हो गए। अनशन तोड़ने वक्त अगर आपको अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के मुंह से निकले शब्द याद हों तो, उन्होंने भी गीतिका के सुसाइड में लिखे शब्दों से मिलते जुलते अल्फाज ही निकाले। मसलन हमलोगों के साथ धोखा हुआ है,सरकार पर से भरोसा टूट गया है, इसीलिए हमलोगों ने राजनीति में जाने का फैसला किया है। कह सकते हैं जुनून कहीं न कहीं कमजोर पड़ा और सत्ता या पावर का रुतबा इनके मकसद पर भारी पड़ गया। गीतिका का अंजाम तो देख ही लिया, अब अन्ना और उनके सहयोगियों के हश्र के लिए खड़ा होना पड़ेगा, 2014 के चौराहे पर। क्योंकि, उस चौराहे पर किसी एक का मवाद तो निकलना तय ही है। तब तक याद जरुर रखिएगा “ ‘ से सुसाइड भी होता है, से सियासत भी होता है और से ही सर्वनाश भी होता है



शर्म आती है मुझे...


बात 26 जुलाई की है। सुबह-सुबह हाथों में अखबार लिया,तो पता चला कि,आज विजय दिवस है। थोड़ी देर के लिए उन जवानों को याद किया,फिर दफ्तर के लिए निकल पड़ा। वहां जाकर अपने बॉस को बताया कि,आज करगिल युद्ध के तेरह साल हो गए,उनकी प्रतिक्रिया थी,अच्छा इतने साल बीत गए। मैं समझ गया,उनकी मंशा। फिर खबरों की दुनिया में व्यस्त हो गया। अचानक लखनऊ से खबर आई कि,किसी ने मायावती की मूर्ति को तोड़ दिया। मचाने वाली खबर थी,बाकी चैनलों की तरह हम भी खेल रहे थे,ब्रेकिंग-फोनों के बीच शिफ्ट खत्म हो गया। रात को करीब साढ़े नौ जब टीवी खोला तो जी न्यूज पर स्पेशल प्रोग्राम चल रहा था कि,फिल्मी हीरो याद हैं,लेकिन देश के असली हीरो नहीं। कार्यक्रम देखने के बात अपने आप को तो मैं शर्मिंदा महसूस कर ही रहा था, लेकिन देश के उन युवा पीढ़ी पर भी मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी, जो कहने को तो कल के भविष्य हैं, लेकिन उन्हें अतीत के बारे में जानकारी ही नहीं। गुस्सा आ रहा था कि,आखिर उस भविष्य से हम क्या उम्मीद करें, जिसकी अतीत की नींव काफी कमजोर है। यकीन मानिए उस दिन अर्सा बाद मैं जी न्यूज का स्पेशल प्रोग्राम देख रहा था,मुद्दा था कि,देश के युवाओं को करगिल या फिर उससे पहले हुए युद्ध के वीर शहीदों के नाम याद हैं। टीवी पर जितनी भी बाइट दिखाई गई,किसी के भी मुंह से एक भी वीर सपूत के नाम नहीं निकले। हां,उन्हें ये जरूर याद था कि,फिल्म बॉर्डर में सन्नी देओल थे,फिल्म एलओसी करगिल में अभिषेक बच्चन थे। मुझे युवा पीढ़ी के दिमाग में सेव इस अनर्गल चीप की मेमोरी पर ही सिर्फ गुस्सा नहीं आया बल्कि,अपने सफेदपोशों पर भी गुस्सा आया। जी न्यूज ने जम्मू में एक ऐसे वीर शहीद की प्रतिमा की हालत दिखाई,जहां पर विजय दिवस के दिन न तो किसी नेता ने,न ही किसी अधिकारी ने और न ही आम जनता ही उस वीर सपूत की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करना मुनासिव समझा। दोस्तों शुरुआत में मैंने जिक्र किया था,मायावती की मूर्ति का। उस दिन दोपहर बाद करीब पौने दो बजे माया की मूर्ति तो क्षत-विक्षत किया गया,और रात के साढ़े दस बजते-बजते नई मूर्ति लगाने की कवायद सरकार और प्रशासन ने शुरू कर दी। अब आप ही बताइए। जिस जवान ने अपनी जान देकर देश की मर्यादा का मान रखा,उसकी प्रतिमा को साफ नहीं किया गया,उसकी प्रतिमा पर पुष्प नहीं अर्पित किए गए तो किसी भी अधिकारी और नेता को दर्द नहीं हुआ,लेकिन देश और राज्य को गर्त की ओर धकेलने वाली मैडम माया की मूर्ति टूटी तो हर किसी को दर्द होने लगा,किसी ने आंदोलन की धमकी दी,तो किसी ने रातों रात मूर्ति बनाने का आदेश जारी कर दिया। अब आप ही बताइए मेरा शर्मिंदा होना लाजिमी है कि नहीं ?

बिन तेरे जिंदगी अधूरी है...

उसकी सांस उखड़ रही थी,मैं बेचैन हो रहा था,बॉस कह रहा था,प्रोफाइल तैयार रखो,ब्रेकिंग हेडर तैयार रखो,अब तब की स्थिति थी,उधर आनंद आखिरी सफर की तैयारी में था,और इधर मैं दो रास्ते पर खड़ा था,मेरे कानों में वो कह रहा था,मैं फिर लौटूंगा इसी अंदाज में,और दूसरा यानी बॉस कह रहा था,जिंदगी रंगमंच है। मुझे पता नहीं चला कि,उस पल कौन सच्चा था,कौन झूठा? पर सच यही था कि, सबको कभी अलविदा न कहने वाला बाबर्ची खुद सबको आनंद देकर उस जहां में चला गया,जहां से लौटना नहीं होता। सिर्फ यादें ही याद रहती है। काका शब्द तो बचपन से सुनता आ रहा हूं,पर एक अनजाना काका इतना करीबी बन जाएगा,सोचा नहीं था। अलविदा आनंद।पर जाते-जाते तुमसे इतनी ही गुजारिश है " ऐ मेरे दोस्त लौट के आ जा,बिन तेरे जिंदगी अधूरी है"।