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पहचान छीन लेता है...


कोई हमसे हमारी पहचान छीन लेता है
कोई पल भर में सारे एहसान छीन लेता है
हंसते हैं कम कुछ पल के लिए अगर
तो कोई पल भर में सारी मुस्तान छीन लेता है




रेत पर हम बड़े अरमानों से बनाते हैं घरौंदा
लेकिन एक तूफान हमारे सारे अरमान छीन लेता है
हमारी सदियों की मेहनत को कोई...
बस यूं ही... हंस कर कोई सरेआम छीन लेता है

मैं पंछी... गगन की

मैं पंछी उन्मुक्त गगन की
मत बांधो मुझे डोर में
सारे पंख टूट जाएंगे
पिंजड़े की उस छोड़ में...
      
          दो मुझको रिश्तों का बंधन
          पर उसको यूं मत कसना
          हंसकर उसे निभाना होगा
          कसकर उसे पिरो देना...
          गांठ छुड़ाना मुश्किल होगा...
          अरमान हमारी मत खोना

मैं पंछी उन्मुक्त गगन की
बांधो मुझको डोर में
रिश्तों की डोर मुलायम होगी
जी लूंगी उस कोर में