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बंगला हो गया खाली

 नीतीश कुमार बहुत ज्यादा बोलते नहीं, करने में विश्वास रखते हैं. सियासी पिच पर ऐसे लोग बहुत कम हैं जो इस फॉर्मूले को अपनाते हैं. हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में एलजेपी पार्टी प्रमुख चिराग पासवान ने जेडीयू का बहुत नुकसान किया था. चिराग ने जिस तरह की पॉलिटिक्स की, उससे 42 सीटों पर जेडीयू को हार का सामना करना पड़ा. हर जगह वजह चिराग पासवान बने. यहां तक कि जेडीयू से बड़े भाई का तमगा छिन गया. सीटों की संख्या कम हो गई. नीतीश कुमार का रुतबा पहले वाला नहीं रहा. वो धमक नहीं रही. सियासत में नीतीश ने ये दिन शायद ही कभी देखा होगा.


इतना सब कुछ हो गया बावजूद इसके वो चुप रहे. सियासी दांव चलने के लिए वक्त की ओर देखने लगे. संगठन को मजबूत करने में जुट गए. इसकी शुरुआत उन्होंने खुद अध्यक्ष पद छोड़कर की. आरसीपी को पार्टी को कमान दी, जो रणनीति बनाने में माहिर हैं. वक्त बीतता गया और देखते ही देखते उन्होंने ऐसे मास्टरस्ट्रोक पर काम किया, जिसने सबको हैरान कर दिया. और तो और चिराग के पैरों तले से जमीन खिसका दी. 208 एलजेपी नेताओं को अपने पाले में करके दिखा दिया कि सियासत में अभी भी वो चिराग के 'गुरु' हैं.


जेडीयू ने एलजेपी के बंगले में ऐसी सेंध लगाई कि एक झटके में ऊपर से नीचे तक खाली हो गया. तीर से बंगला को धराशायी कर दिया. चिराग खुद को पीएम मोदी का 'हनुमान' कहते थे. उस 'हनुमान' की पूरी सेना को नीतीश के अपने पाले में कर दिया. अब पासवान फैमिली के अलावा पार्टी में कोई दिख नहीं रहा. चुनाव में चिराग की क्या हालत हुई, वो किसी से छुपी नहीं रही. वो खुद अपनी जमीन गंवा बैठे हैं. सियासी पिच में चिराग के सामने घना अंधेरा है. ये अंधेरा बड़ा ही घना है क्योंकि राजनीति में संगठन के बिना कुछ नहीं होता.


फेरबदल का फेर



अरी ओ मुन्नी की मां, कहां हो ? और अपनी लाडली बिटिया कहां है ? क्या हुआ ? मुन्नी पढ़ाई कर रही है । अगले महीने सरकारी नौकरी का जो एग्जाम है उसी की तैयारी कर रही है अपनी लाडो और हां, एक बात और सुन लो तुम वक्त बेवक्त मेरी बिटिया को पढ़ाई के समय डिस्टर्ब न किया करो। लो जी कर लो बात, भलाई का तो जमाना रहा ही नहीं । मैं कहां मुन्नी की बेहतरी के लिए बेचैन हो रहा हूं, और मुन्नी की मां मुझ पर ही खा-म-खा गुस्सा हो रही है। अच्छा अब जलेबी की तरह घुमावदार बातें न करो । क्यों हाय तौबा मचाए हो बताओ ? पहले मुन्नी को बुलाओ ? जो मुझे कहना है वो लाडो ही समझ सकती है, लाडो की अम्मा नहीं । क्या हुआ मां, क्या हुआ पापा ? अरे बिटिया एक बार फिर से मनमोहन के मुकुट के कुछ मोती बदल गए हैं । पापा...मनमोहन तक तो समझ में  आ गया पर ये मुकुट और उसके कुछ मोती से आपका क्या मतलब है ? अरे मेरी भोली भाली लाडो। अगर सरकारी नौकरी कर ई युग में तू तरक्की की ख्वाहिश रखती हो तो जरा मेरी जलेबीदार बातों को समझा करो, आगे काम आवेगा । मुकुट और मोती का अर्थ है मंत्रिमंडल और मंत्री। एक और रट्टा मार लो कि, मंत्रिमंडल में कुछ मोती को प्रमोशन मिला है और कुछ का डिमोशन हुआ है, और जिन मोतियों की चमक फिकी पड़ गई थी , उसे आंगन की रखवाली के लिए बुला लिया गया है। यानी पापा...अब फिर से मुझे मुकुट के कुछ नए मोतियों के नाम और पोर्टफोलियों को याद करने होंगे । पर पापा...एक बात बताओ कि, जब पिछली बार मनमोहन सिंह ने कैबिनेट का विस्तार किया था तो वो बोले थे कि, आखिरी बदलाव है । तो फिर ऐसा क्या हो गया, जो उन्हें अपनी बातों से पलटना पड़ा । प्रश्न तो तुम्हारा बहुत ही जायज है बिटिया, पर तुम अपनी जेहन में एक बात अच्छी तरह बिठा लो कि, गाड़ी का पहिया (चक्का) और सफेदपोशों की जुबान जितनी बार पलटे, अच्छा माना जाता है। तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि, इस बार भी पिछली बार की तरह अपने प्रधानमंत्री महोदय ने इसे 2014 तक के लिए आखिरी बदलाव बताया है। मुन्नी के पापा...वो अपने राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी मनमोहनी मुकुट के मोती बने की ना ही ? मेरी भाग्यवती राहुल में बड़ी दिलचस्पी है तुम्हारी ? बात दिलचस्पी की नहीं है जी। वो पिछले दफे मैंने कैबिनेट विस्तार के बाद टीवी पर मनमोहन सिंह को ये कहते सुना था कि, राहुल के मंत्रिमंडल में नहीं शामिल होने के फैसले से वो बहुत आहत हैं और आप भी तो कहते थे, लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी मंत्री बनेंगे । भाग्यवान तुम्हारी बातें सौ फीसदी सही हैं पर त्रासदी देखो, इस बार भी मनमोहन सिंह ने मुकुट में नए नवेले मोतियों को जड़ने के बाद यही कहा है कि, आम चुनाव से पहले का ये आखिरी बदलाव है । साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि, राहुल के उनके मुकुट के मोती नहीं बनने का उन्हें बेहद मलाल है । अच्छा पापा...तो कैबिनेट में इस बार राहुल की छाप दिखी की नहीं ? बिटिया ये सब सियासी बातें हैं । इक्का दुक्का चेहरों को छोड़, मुझे तो कोई नहीं राहुल की टीम का नजर आता है। हां एक बात जो मुझे लग रही है, वो ये कि, सब के सब गांधी फैमिली के वफादार हैं। कुल मिलाकर ये समझ लो मनमोहन रूपी पुरानी बोटल में सोनिया और राहुल रूपी मदिरा का कॉकटल भरा गया है और इसी की बदौलत भारत को समझने वाले राहुल रूपी कांग्रेस के तथाकथित युवराज 2014 में सत्ता की कुर्सी का लगाम अपनी हाथों में लेना चाहते हैं । खैर बिटिया फिलहाल तो तुम अपडेट हो जाओ, क्या पता अगले एग्जाम में मुकुट के मोती से जुड़े कुछ प्रश्न आ जाए ? और लाडो की मां तुम भी इस फेरबदल के फेर में न ही उलझो तो अच्छा होगा, क्योंकि सियासत में लकीर सीधी नहीं ढेढ़ी-मेढ़ी होती है । चलो चाय बनाओ। अदरक डाल के।

भच्च हो गया लोकतंत्र का मंदिर



(वैधानिक चेतवानी-ये एक व्यंग्य लेख है और इसमें इस्तीफा की मांग करने वाला किरदार भाजपा नेता सुषमा स्वराज का है, इस्तीफा नहीं देने की मांग पर अड़े शख्स का किरदार पीएम मनमोहन सिंह का है और देवीस्वरुपा मैडम का किरदार सोनिया गांधी का है)
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मुझे इस्तीफा चाहिए,नहीं मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। देखो मुझे इस्तीफा से कम मंजूर नहीं है,तो तुम भी कान खोलकर सुन लो,इस्तीफा को कोई तुम्हारे खेत की मूली नहीं है,जो तुमने मांगा और मैंने उखाड़ कर दे दिया। देखो इस्तीफा भले ही जनता की खेत की मूली हो,पर मुझे चाहिए। आखिर मुझे भी जनता को जवाब देना है। इस्तीफा शब्द की दीवानी,तुम ये क्यों नहीं समझती कि,मुझे भी तो मैडम दस जनपथ का ख्याल रखना है। तुम ही बताओ क्या मैडम ने मुझे इस्तीफा देने के लिए चुना था, उन्हें मुझ पर भरोसा है और मैं उनके भरोसे को अपना दामन दागदार कर करके भी कामय रखने की कसम ले चुका हूं। मैं तुम्हें भी उस मातास्वरुपा मैडम का वास्ता देकर कहता हूं, ये दौलत भी ले लो,ये शोहरत भी ले लो,पर मुझसे न मांगो ये वजीरेआजम की कुर्सी। अरे तुम कितने बेशर्म हो,कोई तुम्हें अंडर अचीवर कहता है,कोई तुम्हें तुम्हरी मैडम का कठपुतली और कोई तुम्हारी साख पर ही बट्टा लगा रहा है। फिर भी तुम खामोश हो। देखो तुम भी तो कम नहीं,मेरी खामोशी को मेरी कमजोरी समझ रही हो। तुम्हें मैं कैसे समझाऊ,अगर मेरी मेरी जुबान खुली तो मेरे कई साथियों के नकाब तो उतरेंगे ही तुम्हारे भी लगुआ-भगुवाओं की उतर जाएगी। अच्छा तो तुम इस्तीफा नहीं दोगे। कहा न नहीं दूंगा। तुम एक बात बताओ,तुम भी जानती हो की इस हमाम में सभी नंगे हैं तो तुम इस्तीफा मांगने पर क्यों टिकी हो,चलो इस्तीफा छोड़ो चर्चा कर लो। इससे तुम्हारे और मेरे भोले-भाले जनता को भी ये विश्वास हो जाएगा कि, चलो अब तो कुछ हल निकलेगा और इधर,इसी बहाने तुम्हारी भी जय-जय,हमारी भी जय-जय। अरे तेरी जय-जय की तो ऐसी-तैसी करू मैं। मैं समझ रही हूं कि,तुम्हारा इशारा हमारी पार्टी के कुछ राज्यों के मुखिया पर है। देखो मुझे 2014 में तुम्हारी गद्दी पर काबिज होना है और इसके लिए अगर एकाध राजनीतिक बलि भी देनी पड़ी तो मैं देने को तैयार हूं। छी छी कितनी बुरी नियत है तुम्हारी। देखो मैं तुमसे उम्र में बड़ा हूं और इस देश का वजीरेआजम होने के नाते नहीं बल्कि अनुभवों के आधार पर तुम्हें फ्री में एक सलाह दे रहा हूं। नहीं अगर देना है तो इस्तीफा दो। बड़ी नासमझ हो। तुम और तुम्हारी पार्टी इसी वजह से सत्ता में नहीं आ पा रही। बाबा अटल के बीमार होने के बाद तुम सब बेलगाम हो गए हो। देखो ध्यान भटकाने की कोशिश मत करो। कोयले की कालिख से बचने के लिए तुमने पहले ही प्रमोशन में आरक्षण बिल का सहारा ले लिया है। कितने गिर गए हो तुम। कोयले की कालिख से मैं तो पूरी तरह काला हो चुका हूं और रही बात गिरने की,तो मैं साल दो हजार चार के बाद खुद से खड़ा ही कहां हुआ हूं। वो तो अपनी देवीस्वरुपा मैडम हैं। जिनके सहारे मैं टिका हुआ हूं। खैर तुम इन बातों में मत उलझो,मैं तुम्हें मुफ्त में एक नसीहत दे रहा हूं। तुम प्रधान की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब मत पालो और तुम भी इस बात को जानती हो कि,तुम्हारी पार्टी में इस कुर्सी पर बैठने के लिए कितने निजाम ललायित हैं। जानती हो इस कुर्सी की हालत कैसी है। हां चलो जल्दी बताओ कैसी? तुमने गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट वन की प्रोमो देखी थी। अगर नहीं तो मैं बताता हूं। फिल्म के प्रोमो में मनोज वाजपेयी यानी सरदार खान कहता है कि, वो रामाधीर सिंह यानी तिग्मांशु धुलिया की कह के लेंगे लेकिन फिल्म के अंदर सरदार खान का बेटा रामाधीर सिंह की कह के लेता है। यानी प्रोमो में जो दिखाई पड़ता है,वो फिल्म में नहीं है। एक लाइन में कहूं तो स्प्राइट का वो विज्ञापन तुम्हें याद है दिखावे पर मत जाओ अपनी अक्ल लगाओ। इसीलिए कुर्सी का ख्वाब छोड़ दो,बड़ी फजीहत है। मुझे उपदेश मत दो। जबतक इस्तीफा नहीं दोगे मैं लोकतंत्र के मंदिर में हंगामा करती रहूंगी। ठीक है तुम हंगामा अब सड़क पर जाकर करो क्योंकि तुम्हारे इस्तीफे और शोर-शराबे में सत्र की समय सीमा खत्म हो चुकी है। अगले आदेश तक। मिलते हैं एक ब्रेक के बाद...क्योंकि इस बार तो लोकतंत्र के इस मंदिर के सत्र को तुम्हारे इस्तीफे की मांग ने भच्च कर दिया।

“बोल के लब आजाद हैं तेरे…”

वाकई चुप रहना बेहतर है,लेकिन ये तभी अच्छा लगता है जब आपके मुंह खोलने से किसी की इज्जत पर असर पड़े। तब नहीं जब आपके चुप रहने आपकी ही छिछालेदर हो। चुप रहना तब और घातक होता है,जब आप किसी घर या किसी देश के मुखिया हैं और आपके मुंह न खोलने से घर या देश की आन-बान-शान के दामन पर दाग के धब्बे लगाने की कोशिश हो। बड़े बुजुर्ग कह गए हैं ‘मुंह से निकला हुआ शब्द कभी वापस नहीं लौटता’ इसीलिए काफी सोच समझकर किसी भी बात को कहनी चाहिए। इस दुनिया में बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे,जिन्हें हर क्षेत्र में महारथ हासिल हो। हर क्षेत्र के आप महारथी न हो और महारथी समझने की भूल कर बैठते हैं तो मौजूदा हालात में ठीक वैसी ही स्थिति होती है जैसी देश में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उस वक्त होती है जब वो न चाहकर भी भाषण में शेरों-शायरी का इस्तेमाल करते हैं। शेर पढ़ने का या कहने का एक अपना अलग अंदाज है और जरा जेहन में उस वक्त को ताजा कीजिए जब संसद के बाहर या भीतर मनमोहन सिंह ने शेर का इस्तेमाल अपने बयान में किया है। उनकी बॉडी लॉग्वेज देखकर आपको पता चल गया होगा कि, उन्होंने जबरदस्ती शेर का पुट उसमें डाला है। बिना हाव भाव के किसी भी शेर को पढ़ना या कहना । उसके मूल भाव की आबरू को तार-तार करने जैसा होता है। मनमोहन सिंह एक खांटी अर्थशास्त्री हैं,पॉलटिशियन और शायर तो मैं उन्हें कतई नहीं मानता। अगर वो एक कुशल राजनेता होते,तो किसी भी कीमत पर दूसरों की ओर से तैयार किए गए शायरना भाषण या बयान को नहीं पढ़ते। मुद्दा जब कम गंभीर हो तो शेरों शायरी से काम चल सकता है,लेकिन जब बात प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ और उसकी बंदरबांट से जुड़ा हो तो देश के प्रधानमंत्री होने के नाते मनमोहन सिंह का ये कहना कि,
“हजारों जवाबों से बेहतर है मेरी खामोशी,न जाने कितनी सवालों की आबरू रख ली” मनमोहन सिंह को पिछले करीब 8-9 सालों में एक बात तो जरुर समझ में आ जाना चाहिए था कि,प्रधानमंत्री का काम होता है देश की जनता को सुशासन देना, न की धृतराष्ट्र की भांति पुत्रमोह में पड़कर गलत कामों में खामोशी से हामी भरना। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं लाल किले की प्राचीर से मनमोहन सिंह को देश में अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई पर चिंता जताते हुए। खामोश रहकर कौन सी मनमोहनी नीति अपनाकर इस खाई को सिंह साहब पाटने की कोशिश कर रहे हैं। कोयले की कालिख से उनका सफेद लिबास दागदार हो रहा है और उन्हें फिक्र ही नहीं। दूसरे मंत्रियों की भांति उन्होंने भी संवैधानिक संस्था कैग के कामकाज पर सवाल उठा दिया। एक झटके में कह दिया कि,कैग का आकंलन कई आधारों पर गलत है। इतिहास गवाह है कि,कैग ने हमेशा से ही सरकारों को आइना दिखाने का काम किया है। तथ्यों को गलत बताने और जुबान को बंद रखने से बेहतर होगा मनमोहन सिंह के लिए कि,वो तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए उन लोगों पर कड़ी कार्रवाई को तरजीह देते जिन्होंने धरती मां के सीने में अनगिनत सुरंग बनाकर उन्हें तो खोखला करने का काम किया ही,साथ ही साथ देश की मान-मर्यादा पर भी कालिख पोतने की कोशिश की है। मनमोहन सिंह के पास वक्त बहुत कम है। ऐसे में जाते-जाते अगर एक-दो चोर को वे अपने कर-कमलों से सजा दिला जाते तो,इसमें कोई दो राय नहीं कि,इतिहास एक कठपुतली प्रधानमंत्री के बजाए कार्रवाई करने वाले और ईमानदार प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें याद रखेगा। तो चलिए खोलिए प्रधानमंत्री जी अपनी जुबान क्योंकि, फैज अहमद फैज के अल्फाज हैं “बोल के लब आजाद हैं तेरे…”

शर्म आती है मुझे...


बात 26 जुलाई की है। सुबह-सुबह हाथों में अखबार लिया,तो पता चला कि,आज विजय दिवस है। थोड़ी देर के लिए उन जवानों को याद किया,फिर दफ्तर के लिए निकल पड़ा। वहां जाकर अपने बॉस को बताया कि,आज करगिल युद्ध के तेरह साल हो गए,उनकी प्रतिक्रिया थी,अच्छा इतने साल बीत गए। मैं समझ गया,उनकी मंशा। फिर खबरों की दुनिया में व्यस्त हो गया। अचानक लखनऊ से खबर आई कि,किसी ने मायावती की मूर्ति को तोड़ दिया। मचाने वाली खबर थी,बाकी चैनलों की तरह हम भी खेल रहे थे,ब्रेकिंग-फोनों के बीच शिफ्ट खत्म हो गया। रात को करीब साढ़े नौ जब टीवी खोला तो जी न्यूज पर स्पेशल प्रोग्राम चल रहा था कि,फिल्मी हीरो याद हैं,लेकिन देश के असली हीरो नहीं। कार्यक्रम देखने के बात अपने आप को तो मैं शर्मिंदा महसूस कर ही रहा था, लेकिन देश के उन युवा पीढ़ी पर भी मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी, जो कहने को तो कल के भविष्य हैं, लेकिन उन्हें अतीत के बारे में जानकारी ही नहीं। गुस्सा आ रहा था कि,आखिर उस भविष्य से हम क्या उम्मीद करें, जिसकी अतीत की नींव काफी कमजोर है। यकीन मानिए उस दिन अर्सा बाद मैं जी न्यूज का स्पेशल प्रोग्राम देख रहा था,मुद्दा था कि,देश के युवाओं को करगिल या फिर उससे पहले हुए युद्ध के वीर शहीदों के नाम याद हैं। टीवी पर जितनी भी बाइट दिखाई गई,किसी के भी मुंह से एक भी वीर सपूत के नाम नहीं निकले। हां,उन्हें ये जरूर याद था कि,फिल्म बॉर्डर में सन्नी देओल थे,फिल्म एलओसी करगिल में अभिषेक बच्चन थे। मुझे युवा पीढ़ी के दिमाग में सेव इस अनर्गल चीप की मेमोरी पर ही सिर्फ गुस्सा नहीं आया बल्कि,अपने सफेदपोशों पर भी गुस्सा आया। जी न्यूज ने जम्मू में एक ऐसे वीर शहीद की प्रतिमा की हालत दिखाई,जहां पर विजय दिवस के दिन न तो किसी नेता ने,न ही किसी अधिकारी ने और न ही आम जनता ही उस वीर सपूत की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करना मुनासिव समझा। दोस्तों शुरुआत में मैंने जिक्र किया था,मायावती की मूर्ति का। उस दिन दोपहर बाद करीब पौने दो बजे माया की मूर्ति तो क्षत-विक्षत किया गया,और रात के साढ़े दस बजते-बजते नई मूर्ति लगाने की कवायद सरकार और प्रशासन ने शुरू कर दी। अब आप ही बताइए। जिस जवान ने अपनी जान देकर देश की मर्यादा का मान रखा,उसकी प्रतिमा को साफ नहीं किया गया,उसकी प्रतिमा पर पुष्प नहीं अर्पित किए गए तो किसी भी अधिकारी और नेता को दर्द नहीं हुआ,लेकिन देश और राज्य को गर्त की ओर धकेलने वाली मैडम माया की मूर्ति टूटी तो हर किसी को दर्द होने लगा,किसी ने आंदोलन की धमकी दी,तो किसी ने रातों रात मूर्ति बनाने का आदेश जारी कर दिया। अब आप ही बताइए मेरा शर्मिंदा होना लाजिमी है कि नहीं ?

लकीर जरूरी है...


समझ में नहीं आ रहा कि,आखिरकार हमारे राजनेता चाहते क्या हैं। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी कहते हैं कि,मुलायम सिंह यादव भाजपा के एजेंट हैं,और सोनिया गांधी कुर्सी बचाने के लिए मुलायम से दोस्ती करना चाहती हैं। यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान जरा दिग्विजय सिंह के तेवर को याद कीजिए। कैसे-कैसे बयानबाजी कर दिग्गी राजा मीडिया में हेडलाइन बन जाते थे,और अभी जब दिग्गी ने ममता दीदी को नखरेबाज कहकर संबोधित किया तो,कांग्रेस की ओर से फरमान जारी कर दिया गया कि, दिग्विजय सिंह अपनी जुबान को लगाम दें। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार में भाजपा की बदौलत सीएम की कुर्सी पर विराजमान हैं,लेकिन उनको गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा पंसद नहीं है। जिस नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुखिया बनाने के लिए कभी संजय जोशी ने जी तोड़ कोशिश की,उसी संजय जोशी के चलते मोदी को अब सीएम की कुर्सी पर खतरा मंडराते नजर आ रहा है। मोदी को विकास पुरुष कहने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को अब ये बात नागवार गुजर रही है कि,नरेंद्र मोदी दिल्ली की कुर्सी पर विराजमान होने का ख्वाब क्यों संजो रहे हैं। कहने तो सुषमा स्वराज...नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को छोटा भाई कहती हैं,लेकिन बड़ी बहन मुंबई कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को दी जा रही तवज्जों और गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी संविधान में किए गए संशोधन से इस कदर खफा हो गई कि,मायानगरी मुंबई की हलचल को छोड़ सीधे पहुंच गई आस्था की कार्यशाला में। मोदी के बढ़ते कद को लेकर भाजपा के कुछ नेता इस कदर परेशान हो गए कि,पार्टी के मुखपत्र कमल संदेश में इस बात का जिक्र करना पड़ा कि,पार्टी से बढ़कर कोई नहीं हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि,गुटबाजी नहीं होने का ढिंढौरा पीटने वाली भाजपा आखिकार मोदी के बढ़ते कद से खुश होने के बजाए बेचैन क्यूं नजर आ रही है। चाल,चरित्र और चेहरा के सहारे सियासी मैदान में बाजी मारने वाली भाजपा को आखिर हो क्या गया है? खैर ये तो राजनीति है और यहां कुछ भी हो सकता है और सब कुछ जायज भी है। तभी तो आदिवासी राष्ट्रपति बनाने का बिगुल बजाने वाले पीए संगमा इतने स्वार्थी हो गए कि,राष्ट्रपति चुनाव में किसी आदिवासी के नाम को बढ़ाने के बजाए खुद आगे बढ़ गए और मीडिया के सामने हंसते  हुए कह दिए कि,वो राष्ट्रवादी के बजाए आदिवासी कहलाना पंसद करेंगे। देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर रही है,गलत नीतियों के चलते आमलोगों जीना मुहाल हो रहा है,और नेता हैं कि,उन्हें देश की चिंता के बजाए अपने रसूख को कायम रखने की जद्दोजहद से फुर्सत ही नहीं है। आखिर एक लकीर तो खींचनी होगी,जिससे देश का भी कुछ भला हो। सियासत के मैदान में गोता लगाने वाले सियासतदां कभी मौका मिले तो सोचिएगा जरूर...क्योंकि,चुनाव हर पांच साल बाद होते ही हैं...और उसके बाद क्या होगा...ये मुझसे बेहतर आप जानते होंगे। याद रखिएगा...कुछ थप्पड़ों की गूंज तो नहीं सुनाई देती,लेकिन उसके जख्म बहुत गहरे होते हैं।