निशांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
निशांत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

कदमों के निशां बाकी हैं...


रूह टटोली तो तेरी याद के खंज़र निकले
मय मैं डूबे तो तेरे इश्क के अंदर निकले
हम तो समझे थे होगी तेरी याद की चिंगारी
दिल टटोला तो आतिश के समंदर निकले

दफ्तर के अटेंडेंस रजिस्टर में मेरे नाम से पहले निशांत बिसेन का नाम आता था, और शायद बाकी मामलों में भी वो मुझसे आगे ही थे। वो अब हमारे सहकर्मी नहीं रहे लेकिन रिश्तों की मिठास आज भी बनी हुई है। दफ्तर की सीढ़ियां उतरते हुए अटेंडेंस रजिस्टर में अचानक मेरे जस्ट पहले वाले नाम पर नजर गई तो आज भी उनका नाम मुझसे आगे था और बाकी मामलों में आज वास्तव में वो मुझसे बहुत आगे हैं। हां अब अटेंडेंस रजिस्टर में उनके दस्तखत नहीं हैं, लेकिन एक दोस्त के तौर पर हमने जिंदगी भर के करार पर दस्तखत कर लिया है, ये अलग बात है कि अटेंडेंस रजिस्टर की तरह दिल की दस्तखत को नहीं दिखा सकता। उनके साथ काम करने वाले सभी लोगों के साथ कमोबेश ऐसा ही करार है। पहले तो कुछ दिनों तक उनकी गैर मौजदूगी नहीं खली, लेकिन अब उनकी कमी का एहसास होता है।
कहा तरक्की हो गई है, तो हमने भी कहा सही है। फिर वो कहां रुकने वाले थे यहां। बस यादों को छोड़ गए हैं। उनके साथ ज्यादा वक्त बिताने वाले दोस्त आज भी 'दर्शन' और जाने कहां कहां उनके कदमों के निशां को टटोलते हैं। न्यूज रूम और स्टूडियों में आज भी उनकी आवाज गूंजती है। वो तो शुक्र है मोबाइल का जिसमें उनके एसएमएस आज भी उनकी मौजूदगी का एहसास करता है। यादों के झरोखे में तो कई कहानियां है, लेकिन ये पोस्ट कहीं लेख की तरह न हो जाए इसलिए बस इतना ही। कहते हैं दुनिया गोल है... तो चलो कहीं न कहीं मुलाकात तो होगी।

ख़लल तो नहीं पड़ा ?

उस घर के लिए, वो चिराग़ उतना ही क़ीमती है... जितना मेरे घर के लिए मैं और आपके आंगन के लिए आप।।
- निशांत बिसेन



ना ना करते भी शायद अब सरकारों का ये भरम टूटने लगा है कि उनका ख़ुफ़ियातंत्र, उनके सूत्र, उनकी रणनीति और उनके इरादे नक्सलियों पर नकेल लगाने के लिए काफ़ी हैं, ऐसा क्यों है ?? बताने या जताने की ज़रूरत शायद अब नहीं रह गई हो।
       पिछले तीन महीनों में सवा सौ से ज़्यादा CRPF के जवान, नक्सली क़हर का शिकार हो चुके हैं। ये वो जवान हैं.. जो नक्सलियों का मुक़ाबला करने के लिए बाहरी राज्यों से आए थे। ये उन जगहों पर हुई वारदातों में शहीद हुए, जहां का हर ज़र्रा लाल आतंक की ज़द में है। हर क़दम पर बिछा बारूद, हर शै में छिपी क़ातिलाना ख़ामोशी और इन सब से बेख़बर ये जवान... मानो झोंक दिए गए हैं उस समर में, जहां हर क्षण युद्ध के क़ायदे बदले जा रहे हैं।
       अव्वल तो सरकारें ये समझें कि क्यों इन ज़िंदादिल जवानों के सीने पर मौत की इबारत लिखी जा रही है ? क्यों उस रणभूमि में इन्हें अकेला छोड़ दिया गया है, जिसके भौगोलिक हालात से तक ये वाक़िफ़ नहीं ? उधर, नक्सली क़ामयाबी पर क़ामयाबी हासिल किए जा रहे हैं... और इधर, सिरफुटौव्वल जारी है। शहीदों के रिसते ख़ून को साक्षी मानकर हर बार नए सिरे से लड़ाई लड़ने की बात तो कही जाती है, लेकिन... ऐसा नज़र तो नहीं आता। फिलहाल तो यही तय नहीं है कि आर-पार की इस लड़ाई में हमारे लड़ाके कौन हैं ? राज्य पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बल, सेना या फिर कोई और ? सुरक्षा बलों में तालमेल की कमी भी मीडिया के मार्फ़त जगज़ाहिर हो चुकी है, हालिया वारदातों ने जता दिया है कि ख़ुफ़ियातंत्र बुरी तरह से विफल रहा है। यक़ीनन, आए दिन अपने साथियों का हश्र देख रहे जवानों के हौसले पर भी असर दिखने लगा है... वो मरने से नहीं डरते, लेकिन, सिर्फ़ इसलिए तो उन्हें मौत के मुंह में नहीं धकेला जा सकता। सियासी बयानबाज़ियों के लिए देश में मुद्दों की कमी नहीं... सियासतदां, सुरक्षा के मसले पर तो कम से कम संजीदा हों।
       एक वो हैं जो लड़ते-गिरते भारत मां के लिए वीरगति पाते हैं, एक ये हैं जो हर बार पानी सिर से ऊपर हो जाने की दुहाई देते हैं... और फिर ख़तरे के निशान को थोड़ा ऊपर कर देते हैं।

ममता Vs सचिन

बजट का सीज़न है, दिन निकला.. सबको इंतज़ार था.. आज ममता बनर्जी रेल बजट पेश करने जा रही थीं। उम्मीद थी कि कुछ नया होगा। जुलाई 2009 में जब बंगाल शेरनी ने बजट पेश किया तो काफ़ी कुछ नया था, बजट में कुछ नया रहा होगा या नहीं, लेकिन जिस तरह उन्होंने पूर्ववर्ती रेल मंत्री लालू जी को कटघरे में ला खड़ा किया वो जिगरे का काम था। जी हां, उन्होंने सीधे लालू पर निशाना साधा और कहा कि रेलवे का मुनाफ़ा फ़र्ज़ी है, आंकड़ों की बाज़ीगरी है... सीधे तौर पर उन्होंने लालू के इरादों और उनकी कार्यशैली पर ही प्रहार कर दिया या यूं कहे कि लालू की बनती छवि पर पलीता लगा दिया।
    ख़ैर, बारी ममता की थी, अपनी बंगाल केंद्रित छवि से बाहर निकलना चुनौती थी। लेकिन मुमक़िन न रहा, अगर आपने बजट भाषण सुना हो तो महसूस किया होगा कि बाहरी राज्यों की घोषणाओं पर वो जमकर प्रदर्शन करती रहीं, लेकिन दबी ज़ुबान में अगला ऐलान बंगाल के नाम करने से नहीं चूकी। किसको क्या मिला, मायने नहीं रखता... क्योंकि ममता ने सबके लिए कुछ ना कुछ रखा ही था... अब भला Dependence of availability की भाषा कौन समझता है। बजट लोकलुभावन रहा, बंगाल और बिहार की तो मानो पौ बारह हो गई।
   दिन भर ममता मेल, दीदी की ट्रेन, ममता की छुकछुक, ममता से आस, माई नेम इज़ ममता जैसे प्रोग्राम टीवी पर जमकर छाए रहे, चार बजते-बजते ममता की ख़ुमारी उतरी... और छा गए सचिन। जी हां, लोग भूल ही गए कि उन्हें क्या मिला और क्या नहीं मिला। सचिन के डबल धमाके के आगोश में हर कोई ऐसा डूबा कि बजट... गया भाड़ में। टीवी चैनलों ने तो ये तक चला दिया कि 'भूलो बजट को सचिन को देखो'। बेशक़, सचिन का प्रदर्शन बेहतरीन रहा....
     लेकिन सोचिए, क्या हमारा रोमांच... हमारी ज़रूरतो, हमारे अधिकारों पर हावी हो रहा है... वो भी एक ऐसे राज्य में रहते हुए, जिसे कुछ भी नहीं मिला।।