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मीडिया है कमाल

‘’मीडिया...यारों चीज बड़ी है कमाल
यहां बिछा है हर तरफ
खबरों का ही मायाजाल...
संपादक रहते हैं हमेशा बेहाल

उन्हें रहता है अक्सर खबरों का ही मलाल

सुबह-शाम, उठते-बैठते हर वक्त

उन्हें आते हैं खबरों के ही सपने

जितनी भी खबरें दो उनके आगे परस

एक बार में जाते हैं वो गटक

थोड़ी देर में खबरें हो जाती है...हजम

और फिर से करते हैं...खबरों का ही महाजाप

पत्रकार करते हैं खबरों का पोस्टमार्टम

ऐंकर करते हैं पोस्टमर्टम रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार’’

और हर मीडिया हाउस की है ऐसी ही सरकार''

नोट: इस कविता के सभी पात्र काल्पनिक हैं...इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई सरोकार नहीं...ये मात्र भावों की अभिव्यक्ति है..अतः इसका गलत अर्थ न लगाएं

क्या नाम दूं?

इस जिंदगी को...
मैं क्या नाम दूं...?

कभी धूप कहूं कभी छांव कहूं
कभी सैलाबों का नाम मैं दूं

कभी शोर कहूं...कभी मौन कहूं
कभी खामोशी का जाम कहूं....



कभी गम की शाम कहूं
तो कभी इठलाती मुस्कान कहूं



कभी खुशियों का पैगाम कहूं
या जीवन का संग्राम कहूं!

पहचान छीन लेता है...


कोई हमसे हमारी पहचान छीन लेता है
कोई पल भर में सारे एहसान छीन लेता है
हंसते हैं कम कुछ पल के लिए अगर
तो कोई पल भर में सारी मुस्तान छीन लेता है




रेत पर हम बड़े अरमानों से बनाते हैं घरौंदा
लेकिन एक तूफान हमारे सारे अरमान छीन लेता है
हमारी सदियों की मेहनत को कोई...
बस यूं ही... हंस कर कोई सरेआम छीन लेता है