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परदेस की अच्छी बातों से लें सबक

IMF यानि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख डॉमिनिक स्ट्रॉस होटल की महिला कर्मचारी से छेड़छाड़ के मामले में जेल के अंदर हो गए... साथ ही साथ अपना पद भी गंवाना पड़ा... स्ट्रॉस 2012 में फ्रांस के राष्ट्रपति पद के दावेदार भी हैं... अति उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर इतनी त्वरित कार्रवाई देखकर बहुत अच्छा लगा... और वहां की कानून-व्यवस्था और उसे लागू करने के जज्बे के प्रति मन में काफी सम्मान की भावना आई...
लेकिन ये सब देखकर एकबारगी अपने देश की सुस्त और लचर न्याय प्रणाली की तरफ ध्यान खुद ही खिंच गया और एक आक्रोश और गुस्से ने मन में जगह ले ली... वहां तो केवल छेड़छाड़ का आरोप था... फिर भी इतनी तत्परता दिखाई गई... उच्च पद पर आसीन उस व्यक्ति के कितने कॉन्टैक्ट्स होंगे उसका सहज अंदाजा आप लगा सकते हैं.... फिर भी जेल की हवा खानी पड़ रही है... लेकिन हमारे यहां आए दिन बलात्कार की खबरें देखने-सुनने को मिलती हैं... कहीं बाप ने बलात्कार किया... कहीं चाचा ने, कहीं पड़ोसी ने, कहीं भाई ने, कहीं जीजा ने, कहीं दोस्त ने... फिर भी सजा मिलना तो दूर अपराधी पकड़े तक नहीं जाते... गलती से पकड़ भी लिए जाएं तो भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था में उनका बचकर निकलना बहुत आसान होता है... हाई प्रोफाइल मामला तो दूर की बात है... यहां तो छुटभैये अपराधियों की भी इतनी पहुंच होती है... कि पुलिस पहले तो मामला दर्ज नहीं करती... और दबाव में जबरन मामला दर्ज करना भी पड़ गया तो कार्रवाई अत्यंत धीमी होती है... इससे भी आगे कार्रवाई हो और न्यायालय में मामला पहुंचे तो फैसला आते-आते 14-15 साल तो बीत ही जाते हैं... उस पर भी अगर फैसला आ भी गया तो आप हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगा सकते हैं... प्रियदर्शिनी मट्टू जैसे ऐसे कई केस ऐसे ही हैं... ये तो रेप की बात हुई... छेड़छाड़ तो यहां बहुत छोटी और आम बात मानी जाती है... उसे करना तो लड़के अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं... हां लड़कियों को ये समझाइश जरूर दी जाती है... कि कपड़े ऐसे पहनो... तो ऐसे मत चलो... तो ऐसे मत बोलो... etc..
ये तो रही रेप और छेड़छाड़ की बात... लेकिन हत्या, अपहरण जैसे अपराध करने वाले अपराधी भी अपने देश में खुलेआम घूमते हैं... वो भी शान से... यहां तक कि जनप्रतिनिधि तक बन जाते हैं...
हमारा देश स्त्रियों की पूजा करने का दंभ भरता है... और कहता है कि यहां जो विकृति आई है वो पश्चिमी सभ्यता की देन है... लेकिन सच तो ये है कि यहां कुछ परसेंट घरों को छोड़ दें तो कहीं भी स्त्री का सम्मान नहीं है... लोग जिस दिन दुर्गा पूजा करते हैं... उस दिन भी बीवी को गलियाते हैं... मारते-पीटते हैं... यहां तक कि दिल दुःखाने वाली बातें सुनाते हैं... एक तरफ तो पूजा का आयोजन करते हैं... दूसरी तरफ अश्लील बातें करते हैं किसी लड़की के बारे में... जिस बहू-बेटी को लक्ष्मी का रूप माना जाता है... उसे कष्ट पहुंचाने में परिवार वाले कोई कोरकसर नहीं छोड़ते... इतनी इज्जत करते हैं महिलाओं कि आज हर मां-बाप को ये सोचना पड़ रहा है कि बेटी को कहां-कहां दरिंदों से बचाते चलें... और सबसे बड़ी बात तो ये कि दरिंदा कहीं परिवार में ही न हो...
सबसे आश्चर्य की बात तो ये है कि कोल्हापुर में जिस मंदिर में मां लक्ष्मी की पूजा की जाती रही है बरसों से वहीं महिलाओं का प्रवेश कुछ दिनों पहले तक वर्जित था... क्या औरतों को मां के मंदिर में जाने से रोककर उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती थी?
ये सब कोई आज पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से हुआ हो... ऐसा बिल्कुल नहीं है... शुरू से ही हमारे देश में भ्रष्टाचार की और औरतों के प्रति अन्याय की कमी नहीं रही है... कहा जाता था कि स्त्रियों को वेद मत सुनने दो... अगर सुन ले तो उसके कान में पिघला शीशा डाल दो... जबकि सभी भगवान और देवता खुद ही देवियों की पूजा करते हैं, उनकी इज्जत करते हैं, और उन्हें दुःख नहीं पहुंचाते... फिर भी भगवान की कहानी पढ़कर भी बेवकूफ लोगों को समझ में नहीं आता... कि बिना स्त्री कृपा के जीवन में तरक्की नहीं की जा सकती... एक तरफ तो देवियों को पूजा करो... दूसरी तरफ स्त्री रुपी देवी को दुत्कारो.. पहले भी औरतें उठा ली जाती थीं... परदे में दुराचार होता था...बाल विवाह होते थे... सती प्रथा थी.. मारना-पीटना था... चाहे बेइज्जत करना था... चाहे दहेज प्रथा थी... या औरतों को बच्चा पैदा करने की मशीन के तौर पर बिहेव करने की थी... और तुलसीदास ने तो यहां तक कह दिया कि औरत तारण की अधिकारी है... जिस स्त्री के गर्भ में 9 महीने रहे... उसे भी नहीं छोड़ा...उसकी ममता को और सबसे बड़ी बात तो कि अपने वजूद को ही गाली दी... अब उस समय तो ग्लोबलाइजेशन था नहीं कि इंटरनेट के माध्यम से तुलसीदास जी ये बात पश्चिमी देशों से सीख लिए हों...
कुल मिलाकर हमारे देश में स्त्रियों के प्रति अत्याचार कोई नई बात नहीं... सबसे अफसोस की बात तो ये है कि औरतों को दबाकर रखना आज भी गौरव का विषय समझा जाता है... लेकिन उससे भी ज्यादा अफसोस तो इस बात पर है कि औरत स्वयं ही इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है... उस पर से न उसके साथ समाज है, न परिवार और न कानून या न्याय प्रणाली...

अपनी खुशी पर भी दें ध्यान

नोएडा के सेक्टर-29 में अपने ही घर में खुद को 7 महीने से कैद रखने वाली बहनों की दास्तान ने सबके साथ-साथ मेरे भी रोंगटे खड़े कर दिए...अलग-अलग एंगल से मैंने ये खबर कई वेबसाइट्स पर देखी... कितनी भी कोशिश की कि ऐसी खबरों को खबरों के नजरिए से ही देखकर भूल जाऊं... लेकिन ऐसा हो नहीं पाया...

आखिर ऐसा क्यों हुआ... उनके माता-पिता की मौत के बाद अनुराधा (बड़ी बहन) ने अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल का जिम्मा लिया... ये अच्छी बात है कि आप अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं और उसे निभाते भी हैं... लेकिन मेरा ये भी मानना है कि अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में इतना इन्वॉल्व नहीं होना चाहिए... कि खुद को ही इंसान भूल जाए... कोई भी चीज आपके खुद के ऊपर न हावी हो जाए...
अनुराधा सीए थी... उसने भाई-बहनों को पढ़ाया... लायक बनाया... लेकिन जब उसकी जिम्मेदारियां पूरी हो गईं... तो क्या उसे अपनी शादी के बारे में नहीं सोचना चाहिए था... सोनल (छोटी बहन) भी सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल थी... तो क्या उसे भी कोई लड़का नहीं मिल रहा था... भाई विपिन सबसे छोटा था... लेकिन दोनों बहनों ने उसकी शादी सबसे पहले 2007 में करा दी... भाई को भी ये सोचना चाहिए था... और बहनों को भी इस बारे में मनाना चाहिए था कि जितनी रेसपॉन्सिबिलिटी आपको निभानी थीं... आपने निभा लीं... अब पहले आप दोनों बहनों की शादी होनी चाहिए... लेकिन भाई ने भी इसके लिए दिल से कोशिश नहीं की होगी...
ये बहुत बड़ी सच्चाई है औरतों की... कि उनके लिए 30-35 के बाद घर बसाने के लिए जीवनसाथी मिलना अपने समाज में काफी कठिन होता है... कुदरत ने भी मर्द और औरत में, उसकी शारीरिक संरचना में फर्क किया है... जहां कोई लड़की 30 के बाद ढलने लगती है (मेडिकली प्रूव) वहीं लड़के 30 के बाद भी लड़कियों के मुकाबले यंग होते हैं... लड़कियां बड़ी भी जल्दी होती हैं... और लड़के देर से... इसलिए पहले के जमाने में लड़की और लड़के की शादी में दोनों की उम्र में थोड़ा अंतर रखा जाता था... 35से ऊपर की औरत आंटी होती है... जबकि लड़का भइया... लड़की की शादी 35 के ऊपर आश्चर्य या अफसोस का विषय होता है... जबकि लड़के के लिए ये चीज सामान्य मानी जाती है... लड़के के लिए लड़की किसी भी उम्र में मिल जाती है... विधुर हो तो मिल जाती है... तलाकशुदा हो तो मिल जाती है... लेकिन लड़कियों के लिए इन मामलों में काफी मुश्किल होती है... इस सच्चाई को समझना चाहिए...
अनुराधा और सोनल के साथ यही हुआ... माता-पिता की मृत्यु, कोई पुरुष दोस्त नहीं (जिसकी एक उम्र के बाद जरूरत होती है), भाई की शादी... और अलग रहने के लिए चले जाना... इन सबसे ये दोनों टूट गईं... उन्हें लगा कि अब उनाक क्या होगा... कौन सहारा होगा... किसके भरोसे जीएंगी... अच्छे पदों पर रहते हुए एक भावनात्मक असुरक्षा के घर कर जाने की वजह से और लगातार हादसों के कारण वे टूट गईं... और खुद को घर के अंदर बंद कर लिया...
जहां तक भाई और उसकी पत्नी का पक्ष देखें... तो भाई की पत्नी यानी भाभी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता... कोई भी लड़की जब शादी करती है... तो नई-नई शादी में पति का पूरा साथ चाहती हैं... उसके सपने होते हैं... और अगर मैंने अपने भाई के लिए कुछ किया है... तो हम भाई से उम्मीद कर सकते हैं... कि वो मुझे समझे... लेकिन दूसरे घर की बेटी... जिसने ये सब महसूस नहीं किया है... उससे हम इन सबको समझने की उम्मीद नहीं कर सकते... पर्सनली मेरा ये मानना है कि अनुराधा और सोनल चूंकि अकेली थीं... अपनी दुनिया उन्होंने भाई के आसपास ही बना रखी थी... शादी तो कर दी भाई की... लेकिन अचानक से किसी और लड़की का अधिकार भाई पर हो जाना... और उसके हर फैसले किसी और द्वारा लिया जाना... उन्हें जरूर खला होगा (सास-बहू के झगड़े और ईर्ष्या की सबसे बड़ी वजह)... इसके लिए आए दिन तनाव और मनमुटाव होते रहे... जहां तक भाई की बात है... शादी के बाद लड़का न तो पूरी तरह अपने घरवालों का पक्ष ले सकता है न बीवी का... और शादी के बाद पत्नी के प्रति उसकी जिम्मेदारियां नो डाउट ज्यादा होती हैं... क्योंकि पत्नी कंपलीटली उसपर डिपेंड होती है... इन्हीं सब वजह से विपिन अपनी पत्नी के साथ अलग हो गया... और अनुराधा और सोनल डिप्रेस हो गईं... वो हार गईं जिंदगी से... शायद परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते...
मेरी एक फ्रेंड है... जिसके ऊपर भी उसके परिवार की जिम्मेदारियां हैं... उसे एक लड़का प्यार करता था... और शादी करना चाहता था... लकिन वो निर्णय नहीं ले पा रही थी... अक्सर मुझसे पूछती थी कि कैसे अपने भाई-बहनों को छोड़कर शादी कर ले... लेकिन मेरा यही कहना था... कि तुम्हारे भाई-बहन 20 साल से बड़े हो चुके हैं... उन्हें अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए... खासकर भाई को जो 22 साल का है... अब वे इतने छोटे नहीं कि खुद को संभाल न सकें... और कोई जरूरी नहीं कि शादी के बाद तुम उन्हें नहीं संभाल सकतीं... शादी के बाद भी मदद की जा सकती है... उनकी जिम्मेदारियों को पूरा किया जा सकता है... जो लड़का तुमसे प्यार करता है... वो इन चीजों को जरूर समझेगा... वो तुम्हारा साथ जरूर देगा... तुम लड़के के सामने सबकुछ क्लीयर कर दो... और भगवान की कृपा से मेरी दोस्त आज एक सुखी वैवाहिक जीवन जी रही है... और अपने परिवार की मदद भी कर रही है...
अनुराधा और सोनल को क्या मिला ये सब करके... बाकी सब लोग तो अच्छे ही रहे... इधर अच्छी खासी दोनों लड़कियों ने खुद को हड्डी का ढांचा बना लिया... दुनियाभर की बीमारियों का घर बन गया उनका शरीर... इससे फर्क किसे पड़ा... केवल उन दोनों को... बाकी दुनिया अफसोस जताएगी, खुद मैं कुछ दिनों या सालों बाद भूल जाऊं कि कौन अनुराधा या सोनाली... लेकिन दुनिया किसकी चली गई... उन दोनों की... इसलिए किसी के लिए खुद को खोने की जरूरत नहीं... प्यार ऐसा करें जो कन्सट्रक्ट कर दे... डिस्ट्रक्ट नहीं...  
इसलिए खुद को रिश्तों के भंवर जाल में ज्यादा नहीं फंसाना चाहिए... खुद के लिए भी थोड़ा स्वार्थी होना चाहिए... (जिसमें दूसरों की जिंदगी न बर्बाद होती हो), खुश रहना चाहिए... और अपनी खुशियों के बारे में भी सोचना चाहिए... क्यों कि लोग तो केवल छीनने के लिए बैठे हैं... चाहे वो कोई भी हो... अपने बारे में खुद ही सोचना होगा... जो खुद अपनी खुशी के बारे में नहीं सोच सकता ... उसके बारे में दूसरा क्यों सोचेगा... इसलिए थोड़ा स्वार्थी हों... और खुश रहें... भाई-बहन से उम्मीद ज्यादा नहीं रखनी चाहिए... क्योंकि सबके अपने परिवार हैं... उन्हें उनके बारे में भी सोचना है... इसलिए अपना घर भी बसाएं...

कानून से इतर.......

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विवाहपूर्व सेक्स या लिव इन रिलेशनशिप अपराध नहीं और दो वयस्कों के बीच संबंध को रोकने के लिए किसी कानून की व्यवस्था नहीं... मैं भी ये मानती हूं कि सेक्सुअल रिलेशन कंपलीटली किसी का निजी मामला होता है.. लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष से मैं सहमत नहीं हूं... और आगाह करना चाहूंगी ऐसे जोड़ों को जो विवाह पूर्व ऐसे संबंधों में हैं या संबंधों में जाना चाहते हैं...
इसकी कई वजहें हैं... अगर दोनों लोग प्रैक्टिकल हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर साथ रहने के दौरान कोई भी एक पार्टनर संबंधों को लेकर सीरियस हो गया और किन्हीं वजहों से ये संबंध टूट गया तो जो व्यक्ति सीरियस है उसकी ज़िंदगी तो बर्बाद हुई समझो... चूंकि इस तरह के रिलेशन में उत्तरदायित्वों का बंटवारा भी नहीं हुआ रहता है तो अगर बाय चांस हर प्रिकॉशन यूज़ करने के बावजूद कभी बच्चे की नौबत आती है... तो बेवजह उस गर्भ को नष्ट करना पड़ता है... और कभी-कभी ऐसी समस्या बार-बार आने पर स्त्री के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है या लड़कियों द्वारा बार-बार कॉन्ट्रिसेप्टिव पिल्स के इस्तेमाल से भी इसका बुरा असर पड़ता है...  दूसरा अगर इस रिश्ते से निकलकर माता-पिता द्वारा दूसरा रिश्ता बसाया जाता है तो दूसरे रिश्ते को अपनाने में काफ़ी वक्त लगता है... अगर नया पार्टनर पहले से बेहतर है तो इंसान पुराने रिश्ते को 2 मिनट में भूल जाता है लेकिन अगर उससे कमतर कोई मिल जाए... तो तुलनात्मक दृष्टिकोण अपनाते-अपनाते लोग वर्तमान ज़िंदगी से असंतुष्ट रहते हैं... और वर्तमान पार्टनर से न्याय नहीं कर पाते...सामाजिक ढांचे के लिए भी ये सही नहीं है... मान लिया जाए कि अगर आज कुछ वक्त किसी के साथ फिर कल कुछ वक्त किसी के साथ बिताने से एक वक्त के बाद इंसान खुद को स्वयं ही माफ़ नहीं कर पाता... और लगता है कि कहीं न कहीं वो छला गया है... हर इंसान को एक समय के बाद स्थायित्व की तलाश होती है और ऐसे रिश्ते स्थायी नहीं होते... कई बार ऐसा भी देखा गया है कि प्यार होने के बावजूद रिश्ते केवल विवाह पूर्व शारीरिक संबंधों की वजह से टूट गए हैं... क्योंकि लिव इन में रहने से हम सामने वाले की हर अच्छाई और बुराई से वाकिफ हो जाते हैं... और हम ये भी जानते हैं कि अब भी हमारे पास ये ऑप्शन है कि हम दूसरे को छोड़कर एक नया पार्टनर बना लें... इससे रिश्ते जल्दी टूट जाते हैं... जबकि अच्छाई के साथ-साथ बुराई तो सब में होती है... एक और बात ये है कि जब तक कोई चीज़ नहीं मिलती तब तक उस चीज़ के प्रति आकर्षण बना रहता है लेकिन कभी-कभी सबकुछ पा लेना भी रिश्ते के लिए खतरनाक होता है... क्योंकि सबकुछ पा लेने के बाद एक तो आकर्षण कम हो जाता है... और दूसरा फिर वही ऑप्शन की बात... आपको पता है कि आपको एक से तो सबकुछ मिल ही गया अब दूसरे से भी वही चीज़ें आप पा सकते हैं... क्योंकि ऐसे रिश्तों में रेस्पॉन्सिबिलिटी उठाने को कोई तैयार नहीं होता... और जहां केवल अधिकार हो कर्तव्य निभाने की बाध्यता नहीं... ऐसा रिलेशन एक दिन खुद को ही गंदा लगने लगता है... अगर पार्टनर्स रिश्तों को लेकर सीरियस हो जाते हैं तो अंततः उनके मन में शादी का ही ख्याल आता है... क्योंकि शादी को हर तरह के समाज में मान्यता प्राप्त है... क्योंकि कोई भी व्यक्ति जीवनभर लिव इन में रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते... अगर भगवान उन्हें आकर ऑप्शन भी दें तो ऐसी व्यवस्था को वे इसे जीवनपर्यंत के लिए नहीं स्वीकारेंगे... एक बात आपने ध्यान दी होगी कि अगर विवाह पूर्व कोई मां बनने वाली होती है तो वो इस बात को खुलकर खुशी से नहीं बता सकती... चाहे कितनी भी आधुनिक सोसायटी क्यूं न हो... वो ऐसा जानकर इसे अच्छे मन से या खुशी से स्वीकार नहीं करते... मां-बाप बेटी या बेटे को इसके लिए बधाई नहीं देते... जबकि शादी के बाद ऐसी खुशी मिलने पर पूरा घर खुशी से झूम उठता है... क्योंकि सोशल एक्सेपटेंस बहुत बड़ी चीज़ होती है... और समाज से कटकर कोई ज्यादा दिन सरवाइव नहीं कर सकता...
इसलिए ऐसे संबंध बनाएं लेकिन सोच समझकर... क्योंकि शरीर और मन एक दूसरे से जुड़े होते हैं और इमोशनलेस होकर आप संबंधों में नहीं रह सकते...................................................

टीका भी लेता है जान!

मध्यप्रदेश के दमोह में एक ऐसा वाकया सामने आया है जो सरकारी तंत्र की पोल तो खोलता ही है साथ ही इसे सोचकर दिल भी दहल जाता है... आंगनबाड़ी केंद्र में 2 साल तक के बच्चों को यहां खसरे के टीके लगाए गए... जिसकी वजह से अबतक 4 बच्चों की मौत हो चुकी है और 17 बच्चे बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हैं... वैसे तो मामले में कार्रवाई की गई है, मुआवज़े का ऐलान भी किया गया है... लेकिन ये सब कर लेने से उन मां-बाप को क्या मिलेगा जिन्होंने अपने आंखों के तारे खोए हैं... वे वापस तो नहीं आ जाएंगे... और मुआवज़े का ऐलान करके सरकार क्या सोचती है कि परिजन पैसों के भूखे होते हैं.. जिसका बच्चा ही चला गया... जिसे लेकर इतने सपने बुने गए थे, फिर पैसे किस काम के... पैसा बेटे या बेटी की जगह तो नहीं ले सकता... मरने के बाद जब कोई मुआवज़े का ऐलान करता है... तो पर्सनली मुझे ऐसा लगता है कि जले पर नमक छिड़का जा रहा हो... या श्राद्ध करने के लिए पैसे दिए जा रहे हों...
वैसे इस घटना ने सभी मां-बाप खासकर उन गरीब मां-बाप के दिलों को दहला दिया है, जिनके पास सरकारी अस्पताल के भरोसे रहने के अलावा या सरकारी योजनाओं के भरोसे रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता... सचमुच अब तो जिस भी चीज़ के आगे सरकारी शब्द लगता है उससे डर लगने लगता है... आखिर गरीब जाएं तो जाएं कहां इलाज ना कराएं तो भी बेमौत मरना है और करवाएं तो भी....
एक न्यूज़ चैनल काफ़ी समझाइश दे रहा था कि दवाओं की एक्सपायरी देखें, उनसे दवाओं की जानकारी लें वगैरह-वगैरह... लेकिन जहां 100 लोग अपने-अपने बच्चों को लाइन में लेकर खड़े हैं प्रैक्टिकली ये संभव नहीं कि हर गार्जियन को एक्सपायरी डेट दिखाई जा सके... और गरीब और अशिक्षित लोगों को देखकर तो वैसे ही लोग इन्हें दबा देते हैं... इसलिए न्यूज़ चैनल को सच की धरातल पर रहकर खबर दिखानी चाहिए हवा-हवाई बातें नहीं करनी चाहिए...

खैर जो भी इन बच्चों की मौत के ज़िम्मेदार हैं उन्हें फांसी की सज़ा मिलनी चाहिए ताकि ऐसी लापरवाही करने की जुर्रत भविष्य में कोई न कर सके....... क्योंकि जीवन देना बहुत मुश्किल है और लेना बहुत आसान.......

महिलाओं का फैसला करने वाले ये हैं कौन?

महिला आरक्षण बिल के लाइमलाइट में आने के बाद से ही इसपर सियासत गर्म है, साथ ही तरह-तरह के लोगों, संगठनों द्वारा बयानबाज़ी की बयार बह रही है... नया बयान है...शिया धर्म गुरू कल्‍बे जव्‍वाद का... जिन्होंने महिलाओं को अच्‍छे नस्‍ल के बच्‍चे पैदा करने की मशीन बताया है, औरत को उसका फर्ज याद दिलाया है, वो भी खुदा का हवाला देकर... जबकि कोई भी धर्म, धर्मग्रंथ औरत और मर्द के बीच कोई भेदभाव नहीं करता बल्कि हर धर्म के प्रोफेट अपने-अपने सुविधानुसार धर्म की बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं... 
औरत में सृष्टि के सृजन की क्षमता है, और सृजन की क्षमता का दायित्व उसे ही सौंपा जाता है जो ज्यादा सामर्थ्यवान हो, तो भगवान ने तो पहले ही तय कर दिया कि औरत और मर्द में कौन ज्यादा सामर्थ्यवान है...
जहां तक है बच्चा पैदा करने की बात तो जिस तरह से वाक्य का प्रयोग किया गया है...''औरतें राजनीति नहीं बच्चा पैदा करें'' इसपर किसी भी महिला को घोर आपत्ति होगी, क्योंकि हमारा जन्म मनुष्य योनि में हुआ है, जो विवेकशील है... कुत्ते-बिल्ली में नहीं या कीड़े-मकोड़ों में नहीं जो एक ही बार में 8-8 बच्चे पैदा करते हैं और करते ही रहते हैं... और जहां तक बात है अच्छी नस्ल की, तो जहां ऐसे-ऐसे विचारों वाले लोग हैं वहां बच्चों की मानसिकता क्या होगी, वो अपनी मां-बहन और स्त्री जाति को कितना सम्मान देंगे, कितने संवेदनशील होंगे, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है... जहां तक बात है पर्दे की... तो वैसे तो शर्म नजर और व्यवहार में होनी चाहिए लेकिन अगर इसे मान भी लें तो बेनज़ीर भुट्टो, खालिदा जिया और शेख हसीना जैसे उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं...जहां तक बात है बच्चों की देखभाल और परवरिश का तो बच्चे के लिए औरत-मर्द दोनों जिम्मेदार हैं इसलिए उनकी देखभाल और बच्चों से जुड़ी सारी जिम्मेदारियां दोनों को मिलकर उठानी चाहिए... या पुरुष को मान लेना चाहिए कि उसका कोई वास्ता बच्चे से नहीं है और वो कभी उसपर अपना अधिकार नहीं जताएगा...
और इधर बाबाओं की करतूत पर अयोध्या के संत-महंतों का कहना है कि महिलाएं मंदिरों में अकेली न जाएं... बाबाओं को कंट्रोल करने के बजाए वे महिलाओं को सलाह दे रहे हैं... अफसोस होता है मुझे संत-महंत और सभी धर्म के धर्म गुरुओं पर...
वैसे निष्कर्ष यही है कि औरतें अपने अधिकारों को पहचानें और एकजुट हों क्योंकि एकता में बहुत ताकत है और इसे कोई नहीं दबा सकता...

भगदड़ः ज़िम्मेदार कौन?

गुरुवार को यूपी प्रतापगढ़ के राम जानकी मंदिर में मची भगदड़ में करीब 63 लोगों ने अपनी जानें गंवा दीं... मरने वालों में केवल महिलाएं और बच्चे थे... भगदड़ में करीब 200 लोग घायल हो गए... मंदिर में कृपालु महाराज का प्रवचन और इसके बाद भंडारे की व्यवस्था थी... साथ ही भक्तों को थाली और लोटे भी बांटे जा रहे थे...
भगदड़ के बाद से ही मामले का पोस्टमार्टम शुरू हो गया है और सभी अपने-अपने विचारों से इसकी वजह बता रहे हैं...
मंदिर के किसी आयोजन में भगदड़ मच जाना कोई नई बात नहीं है... चाहे वो नैना देवी का मामला हो या कोई और... घटना के बाद सभी प्रशासन और सरकार को कोसने लगते हैं... लेकिन कभी कोई खुद के ऊपर ऊंगली नहीं उठाता... मरने वालों की भी लापरवाही पर गौर नहीं की जाती... क्योंकि शायद मरने वालों पर ऊंगली उठाना अच्छा नहीं लगता होगा, शायद मृतक के परिजनों के जले पर नमक छिड़कना लगता होगा... लेकिन ये भी सौ फीसदी सच है कि प्रशासन की गलती तो जो होती है वो तो होती ही है... लेकिन मरने वाले भी इसमें कम ज़िम्मेदार नहीं होते...
अगर कल की ही घटना लें तो थाली-लोटा लेने के लिए कोई लाइन नहीं थी... सब एक के ऊपर एक चढ़े जा रहे थे... उनके मन में भगवान वगैरह के ऊपर कोई श्रद्धा नहीं थी, क्योंकि श्रद्धा तो किसी भी दिन और कहीं से भी दर्शाई जा सकती है, केवल लालच में लोग एक-दूसरे के ऊपर चढ़े हुए थे... अब उनकी उम्र इतनी कम तो नहीं थी कि उन्हें लाइन में लगने को भी कहा जाए, लेकिन यहां अक्सर देखती हूं कि जबतक लाठी-डंडों से बात नहीं की जाए, डांटा न जाए, तबतक लोग रूल्स फॉलो ही नहीं करते... मान लिया जाए कि कोई देखने वाला नहीं था, लेकिन सेल्फ़ डिसिप्लिन (स्वनुशासन) भी तो कोई चीज़ होती है न, वो तो यहां के लोगों में है नहीं, और चलेंगे दूसरों को दोष देने.. तो लोगों ने इतनी धक्का-मुक्की की, कि मंदिर का गेट ही टूट गया और उसके बाद मची भगदड़ में इतनी जानें गईं... जिनमें निर्दोष बच्चे भी शामिल थे... साथ ही कुछ और निर्दोष लोग भी जिनकी सचमुच कोई गलती नहीं रही होगी... और जो दूसरों की धक्कामुक्की का शिकार हो गए...

दूसरा कि आजकल टीवी पर बाबाओं के स्कैंडल की भरमार है... उसके बाद भी लोगों को ये समझ में नहीं आता क्या कि इंसान और भगवान के बीच किसी थर्ड पार्टी की ज़रूरत नहीं है... तो इतने स्कैंडल्स लगातार उजागर होने के बावजूद अगर लोग वहां गए तो इसका मकसद क्या था... वो भी इतनी बड़ी संख्या में... क्योंकि भगवान से जुड़ा आयोजन तो वहां था नहीं... वहां तो बाबा से जुड़ा आयोजन था... ऊपर से इस आयोजन को प्रशासन से अनुमति भी नहीं थी...
कल की ही बात है, जब मेरे मुहल्ले में रहने वाली महिलाएं केवल इसलिए मंदिर गईं कि किसी 4 हाथ-पांव वाले बच्चे ने उड़ीसा में कहीं जन्म लिया है, अब सोचिए कि ये बात उस बच्चे के माता-पिता और उस बच्चे के लिए कितनी दुःखद है कि वो नॉर्मल बच्चा नहीं है, किसी जेनेटिक गड़बड़ी के कारण उसका ये हश्र हुआ है, और ऐसे बच्चे सर्वाइव भी नहीं कर पाते, और न ऐसे मां-बाप के पास करोड़ों रुपए होते हैं... कि वे ऑपरेशन से उसे एक नॉर्मल ज़िंदगी दे सकें... लेकिन यहां तो अंधविश्वास का ये आलम है कि बस पूछिए मत... मैं तो हतप्रभ ही रह गई, और आप शिक्षित करने की बात करते हैं... हो सकता है कि आप वजह समझाने की कोशिश करें और आप ही को पिटाई लग जाए...
इसलिए ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन को तो चुस्त रहना ही पड़ेगा, लेकिन साथ ही श्रद्धालुओं को भी सेल्फ़ डिसिप्लिन्ड होने की आवश्यकता है, क्योंकि जाते तो हैं भगवान के दर्शन करने लेकिन मैंने अपने कानों और आंखों से मन में दुर्भावना पाले हुए देखा है उन्हें, जो मंदिर जाकर भी अपने परिवार की बुराई करते हैं... या गंगा स्नान कर पाप धोने के बाद भी लोगों को सताते हैं...

बच्चों के दुश्मन

बहुत दुःख हुआ ये सुनकर कि बिहार के जमुई में हुए नक्सली हमलों में बच्चों का इस्तेमाल किया गया है... कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं तो क्या हमारा भविष्य ऐसा है? दोष किसका है... व्यवस्था का, माता-पिता का या खुद हमारा... बहुत बड़ा सवाल है ये... माता-पिता समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वे अपने नौनिहालों को किस गर्त में पहुंचा रहे हैं... और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अपने बच्चों का कितना गलत इस्तेमाल कर रहे हैं... आप सोच रहे होंगे कि मैं मां-बाप को दोषी क्यूं बता रही हूं... वो इसलिए क्योंकि हर मां-बाप को ये मालूम होता है कि उसका बच्चा कहां जा रहा है, क्या कर रहा है... किस तरह की शिक्षा प्राप्त कर रहा है... क्योंकि बड़े लड़के-लड़कियों को कंट्रोल करना थोड़ा मुश्किल है... लेकिन बच्चों के मामले में उनकी हर हरकत के लिए मां-बाप पूर्णतः जिम्मेदार होते हैं... इस केस में भी ट्रेनिंग के लिए भेजने वाले मां-बाप ही हैं.... या हो सकता है कि बच्चों में बहुत सारे नक्सलियों के ही बच्चे हों... जो अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपने ही बच्चों की ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हैं...
मुझे तो लगता है कि आज नक्सली अपने उद्देश्य से ही भटक गए हैं... क्योंकि उनकी लड़ाई शासन से थी... लेकिन वे आम लोगों के दुश्मन नहीं थे... लेकिन अब शासन पर दबाव बनाने के लिए वे मासूम लोगों को निशाना बना रहे हैं... स्कूल-कॉलेज जला रहे हैं... जबकि स्कूल-कॉलेज, अस्पताल उनके और उनके परिवार के लिए भी हैं.... जहां बच्चों को देश के सकारात्मक विकास में योगदान देने वाला बनाना चाहिए वहां नक्सली इन्हें बम और बंदूक चलाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं... वो भी किसी दुश्मन को मारने के लिए नहीं बल्कि अपना ही घर उजाड़ने के लिए... काश कि अपनी इस योग्यता का उपयोग ये देश की सीमा पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए करते... ख़ैर सरकार को नक्सलियों पर और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि देश आंतरिक आतंकवादियों से मुक्त हो सके.... देश का नमक खाकर उससे गद्दारी करने वाले नक्सलियों से मुक्त हो सके...

महंगाई बढ़ने के फायदे

अब तक जहां भी देखा, पढ़ा और सुना... हर जगह महंगाई के नुकसान ही गिनाए गए... कितनी भाषणबाज़ी, बंद और सियासत भी हो गई इस पर... लेकिन जिस तरह से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं... इसके भी हैं... इसलिए आज मैं फोकस करुंगी इससे होने वाले फायदे पर... जिनपर संभवतः अब तक किसी का ध्यान नहीं गया है....महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा फ़ायदा तो ये है कि लड़कियों और महिलाओं को बांधकर रखने वाला समाज अब थोड़ा उदार हो गया है... पुरुष भी जो पहले अपने अहम के मारे होते थे... अब इसे साइड में रखकर चल रहे हैं... पहले पुरुष सोचता था... जब मैं कमा ही रहा हूं तो घर की औरत को कमाने के लिए बाहर निकलने की ज़रूरत ही क्या है... मैं क्या नामर्द हूं जो औरत की कमाई खाउंगा... औरत तो घर के कामकाज के लिए बनी है... लेकिन भला हो इस महंगाई का जिसने पुरुष को धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है... अब उसे पता चल गया है कि अगर घर ठीक से चलाना है... सुख-सुविधा के साथ रहना है... बच्चों की अच्छी परवरिश करनी है तो दोनों को समान रूप से घर और बाहर हाथ बंटाना होगा... महंगाई ने स्त्री को खुद ही समानता का अधिकार दे दिया... जिस बात को पुरुषों को बरसों से समझाया जा रहा था कि स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं और उन्हें हर काम मिलकर करना चाहिए... वो महंगाई के कारण खुद ब खुद उनकी समझ में आ गई... अब तो बाकायदा लड़के कामकाजी लड़कियों की डिमांड कर रहे हैं...अब जब कामकाजी लड़कियों की डिमांड होगी तो दहेज तो अपने आप ही कम हो जाएगा... क्योंकि लड़के के परिवारवोलों को लगता है कि ये तो सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है... हर महीने तनख्वाह लाएगी... अब बताइए... महंगाई किस तरह से दहेज के खिलाफ भी अपना योगदान दे रही है... ऊपर से कमाने के कारण लड़की को समाज-परिवार में मान-सम्मान अलग... बोनस में... लड़की आत्मनिर्भर हुई वो अलग... और पति की सही मायनों में सहचरी भी हुई... और अब के लड़कों को भी अपनी पत्नी की प्रगति से खासी खुशी मिलती है... पैसों के लालच में नहीं बल्कि जेन्यूनली... उनकी मानसिकता भी बदल रही है... और वे चाहते हैं कि उनकी पत्नी भी किसी भी मायनों में उनसे कम न हो...महंगाई के कारण बेटा-बेटी में भेद करने वाले माता-पिता भी आजकल लड़कियों की पढ़ाई के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं... और युवा से लेकर पैरेंट्स तक का रुझान करियर ओरिएंटेड कोर्सेस में पढ़ रहा है... जबकि पहले आर्ट्स सब्जेक्ट ही लड़कियों को थमा दिया जाता था... या बहुत से बहुत किसी तरह बीए करवाकर मां-बाप अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते थे... या सिलाई-कढ़ाई जैसी चीजें सिखाकर ससुराल भेज देते थे...अब भआरतीय अर्थव्यवस्था में स्त्री-पुरुष बराबर का योगदान कर रहे हैं... और हमारी अर्थव्यवस्था और हमारा देश सही मायनों में महाशक्ति बनकर उभर रहा है... लड़कियों के आत्मनिर्भर होने के कारण अब परिवार भी ज्यादा संपन्न हो रहा है... इससे ये भी फ़ायदा हो रहा है कि वे अपना मनपसंद जीवनसाथी भी चुन रही हैं... और समाज उनकी पसंद पर मुहर भी लगा रहा है... वे यूं ही अत्याचार नहीं सह रहीं... बल्कि उनमें अब परिस्थितियों से लड़ने का साहस भी आ गया है... और आपने गौर किया होगा कि महंगाई बढ़ रही है लेकिन उसके साथ ही परचेज़िंग पावर में भी गज़ब का इज़ाफ़ा हुआ है....तो जब महंगाई के इतने फ़ायदे हैं तो भला हो इस महंगाई का................